भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 978 में से

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पृष्ठ 406
४०२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

ष्टामुपकोसलायेति । तस्मा एवं जाययोक्तोऽपि हा प्रोच्यैवानुक्त्वैव किञ्चित्प्रवासाञ्चक्रे प्रवसितवान् २किन्तु, स्त्रीद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर भी, वह उससे कुछ कहे बिना ही बाहर चला गया ॥ २ ॥

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स ह व्याधिनानशितुं दध्रे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिन्नशान किं नु नाश्नासीति। स होवाच बहव इमऽस्मिन्पुरुषे कामा नानात्यया व्याधिभिः प्रतिपूर्णोऽस्मि नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥

उस उपकोसलने मानसिक खेदसे अनशन करनेका निश्चय किया। उससे आचार्यपत्नीने कहा—‘अरे ब्रह्मचारिन् ! तू भोजन कर, क्यों नहीं भोजन करता ?’ वह बोला—‘इस मनुष्यमें बहुत-सी कामनाएँ रहती हैं जो वस्तुके स्वरूपका उल्लङ्घन करके अनेक विषयोंकी ओर जानेवाली हैं। मैं उन्हीं नानात्यय (बहुमुखी) मानसिक चिन्ताओंसे परिपूर्ण हूँ, इसलिये भोजन नहीं करूँगा’ ॥ ३ ॥

(खेदादुपकोसलस्यानशनम्)

स होपकोसलो व्याधिना मानसेन दुःखेनानशितुमनशनं कर्तुं दध्रे धृतवान्मनः। तं तूष्णीमग्न्यगारेऽवस्थितमाचार्यजायोवाच हे ब्रह्मचारिन्नशान भुङ्क्ष्व किं नु कस्मान्नु कारणान्नाश्नासीति। <br><br> स होवाच बहवोऽनेकेऽस्मिन्पुरुषेऽकृतार्थे प्राकृते कामा इच्छाः कर्तव्यं प्रति नानात्ययो-उस उपकोसलने व्याधि—मानसिक दुःखसे अनशन करनेका मनमें निश्चय किया। तब अग्निशालामें चुपचाप बैठे हुए उससे आचार्यपत्नीने कहा—‘हे ब्रह्मचारिन् ! अशन—भोजन कर, क्यों—किस कारणसे भोजन नहीं करता ?’ <br><br> वह बोला—‘इस अकृतार्थ साधारण पुरुषमें अपने कर्तव्यके प्रति बहुत-सी कामनाएँ—इच्छाएँ रहती हैं, जिन व्याधियों—कर्तव्य-
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