छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 416, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादश खण्ड
—: o :—
अन्वाहार्यपचनाग्निविद्या
अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशासापो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति । य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥
फिर उसे अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) ने शिक्षा दी—'जल, दिशा, नक्षत्र और चन्द्रमा [ ये मेरे चार शरीर हैं ]। चन्द्रमामें जो यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ' ॥ १ ॥
स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥
वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इस (चार भागोंमें विभक्त अग्नि) की उपासना करता है, पापकर्मोंका नाश कर देता है, लोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है और उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। उसके पीछे होनेवाले पुरुष (वंशज) क्षीण नहीं होते तथा इस लोक और परलोकमें भी हम उसका पालन करते हैं, जो कि इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है ॥ २ ॥
| अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशास दक्षिणाग्निरापो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इत्येता मम चतस्रस्तनवश्चतुर्धाहमन्वाहार्यप- | फिर उसे अन्वाहार्यपचन—दक्षिणाग्निने शिक्षा दी—'जल, दिशा, नक्षत्र और चन्द्रमा—ये मेरे चार शरीर हैं। मैं अपनेको चार प्रकारसे विभक्त करके अन्वा- |