भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 417
खण्ड १२ ]शाङ्करभाष्यार्थ४१३
संस्कृतहिन्दी
चन आत्मानं प्रविभज्यावस्थितः । तत्र य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति पूर्ववत् ।<br><br>अन्नसंबन्धाज्ज्योतिष्ट्वसामान्याच्चान्वाहार्यपचनचन्द्रमसोरेकत्वं दक्षिणदिक्संबन्धाच्च । अपां नक्षत्राणां च पूर्ववदन्नत्वेनैव संबन्धः । नक्षत्राणां चन्द्रमसो भोग्यत्वप्रसिद्धेः । अपामन्नोत्पादकत्वादन्नत्वं दक्षिणाग्नेः पृथिवीवद्गार्हपत्यस्य । समानमन्यत् ॥ १-२ ॥हार्यपचनरूपसे स्थित हूँ। उनमेंसे चन्द्रमामें जो यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ—' ऐसा पूर्ववत् समझना चाहिये ।<br><br>अन्नसे ¹ सम्बन्ध होनेके कारण, ज्योतिष्ट्वमें समानता होनेसे तथा दक्षिण ² दिशासे सम्बन्ध होनेके कारण अन्वाहार्यपचन और चन्द्रमाकी एकता है । जल और नक्षत्रोंका तो पूर्ववत् अन्नरूपसे ही सम्बन्ध है, क्योंकि नक्षत्र चन्द्रमाके भोग्य हैं, यह प्रसिद्ध है तथा अन्नके उत्पत्तिकर्ता होनेके कारण जलोंका भी इसी प्रकार दक्षिणाग्निका अन्नत्व प्राप्त है जैसे पृथिवीको गार्हपत्याग्निका । शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १-२ ॥
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—: ॐ :—

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥

—: ० :—

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१. दर्श-पूर्णमास यज्ञमें अन्वाहार्यपचन अग्निमें हविष्य पकाया जाता है; तथा चन्द्रमाके विषयमें 'चन्द्रमाको प्राप्त होकर अन्न हो जाता है' ऐसा श्रुति-वाक्य है । इसलिये इन दोनोंका अन्नसे सम्बन्ध है ।
२. अन्वाहार्यपचनको दक्षिणाग्नि भी कहते हैं; तथा चन्द्रमाको भी दक्षिण मार्गसे जानेवाले ही प्राप्त होते हैं । इसलिये इन दोनोंका दक्षिण दिशासे सम्बन्ध है ।