भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 421, कुल 978 में से

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पृष्ठ 421

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्य ४१७


आचार्य और उपकोशलका संवाद

भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद् इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वानुशशासेति को नु मानुशिष्याद्भो इतीहापेव निहुत इमे नूनमीदृशां अन्यादृशा इतोहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किलऽते वोचन्निति ॥ २ ॥

उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया। [ आचार्य बोले— ] 'हे सोम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताके समान जान पड़ता है; तुझे किसने उपदेश किया है ?' 'अजी ! मुझे कौन उपदेश करता' ऐसा कहकर वह मानो उसे छिपाने लगा। [ फिर अग्नियोंकी ओर संकेत करके बोला— ] 'निश्चय इन्होंने [ उपदेश किया है ] जो अन्य प्रकारके थे और अब ऐसे हैं'—ऐसा कहकर उसने अग्नियोंको बतलाया। [ तब आचार्यने पूछा— ] 'हे सोम्य ! इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ?' ॥ २ ॥

इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान्वाव किल सोम्य तेऽवोचन्नहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच ॥ ३ ॥

तब उसने 'यह बतलाया है' ऐसा कहकर उत्तर दिया। [ इसपर आचार्यने कहा— ] 'हे सोम्य ! उन्होंने तो तुझे केवल लोकोंका ही उपदेश किया है; अब मैं तुझे वह बतलाता हूँ जिसे जाननेवालेसे पापकर्मका उसी प्रकार सम्बन्ध नहीं होता जैसे कमलपत्रसे जलका सम्बन्ध नहीं होता।' वह बोला—'भगवान् मुझे बतलावें।' तब आचार्य उससे बोले ॥ ३ ॥