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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्य ४१७


आचार्य और उपकोशलका संवाद

भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद् इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वानुशशासेति को नु मानुशिष्याद्भो इतीहापेव निहुत इमे नूनमीदृशां अन्यादृशा इतोहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किलऽते वोचन्निति ॥ २ ॥

उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया। [ आचार्य बोले— ] 'हे सोम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताके समान जान पड़ता है; तुझे किसने उपदेश किया है ?' 'अजी ! मुझे कौन उपदेश करता' ऐसा कहकर वह मानो उसे छिपाने लगा। [ फिर अग्नियोंकी ओर संकेत करके बोला— ] 'निश्चय इन्होंने [ उपदेश किया है ] जो अन्य प्रकारके थे और अब ऐसे हैं'—ऐसा कहकर उसने अग्नियोंको बतलाया। [ तब आचार्यने पूछा— ] 'हे सोम्य ! इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ?' ॥ २ ॥

इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान्वाव किल सोम्य तेऽवोचन्नहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच ॥ ३ ॥

तब उसने 'यह बतलाया है' ऐसा कहकर उत्तर दिया। [ इसपर आचार्यने कहा— ] 'हे सोम्य ! उन्होंने तो तुझे केवल लोकोंका ही उपदेश किया है; अब मैं तुझे वह बतलाता हूँ जिसे जाननेवालेसे पापकर्मका उसी प्रकार सम्बन्ध नहीं होता जैसे कमलपत्रसे जलका सम्बन्ध नहीं होता।' वह बोला—'भगवान् मुझे बतलावें।' तब आचार्य उससे बोले ॥ ३ ॥

४१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १४

४१८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १४

| भगव इति ह प्रतिशुश्राव । <br><br> ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं प्रसन्नं भाति, को नु त्वानुशशासेत्युक्तः प्रत्याह—को नु मानुशिष्यादनुशासनं कुर्यात्को भगवंस्त्वयि प्रोषित इतीहापेव निह्नुतेऽपनिह्नुत इवेति व्यवहितेन संबन्धः, न चापनिह्नुते न च यथावदग्निभिरुक्तं ब्रवीतीत्यभिप्रायः । <br><br> कथम् ? इमेऽग्नयो मया परिचरिता उक्तवन्तो नूनं यतस्त्वां दृष्ट्वा वेपमाना इवेदृशा दृश्यन्ते पूर्वमन्यादृशाः सन्त इतीहाग्नीनभ्यूदेऽभ्युक्तवान्काक्वाग्नीन्दर्शयन् । किं नु सोम्य किल ते तुभ्यमवोचन्नग्नय इति पृष्ट इत्येवमिदमुक्तवन्त इत्येवं ह प्रति- | उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया। फिर आचार्यद्वारा 'हे सोम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताके समान प्रसन्न बान पड़ता है, सो तुझे किसने उपदेश किया है, ऐसा कहे जानेपर वह बोला—'भगवन् ! आपके बाहर चले जानेपर भला मुझे कौन उपदेश करता ?' इस प्रकार मानो वह [ अग्निके कथनका ] अपह्नव- ( गोपन ) सा करने लगा। 'अप-इव निह्नुते' इसमें 'अप' उपसर्गका 'इव' के द्वारा व्यवधानयुक्त 'निह्नुते' क्रियाके साथ सम्बन्ध है, अतः 'अपनिह्नुते इव' ऐसा समझना चाहिये। तात्पर्य यह है कि वह अग्निके कथनको न तो ज्यो-का-त्यों बतलाता ही है और न उसे [सर्वथा] छिपाता ही है। <br><br> 'सो कैसे ? देखिये मेरे द्वारा परिचर्या किये हुए इन अग्नियोंने ही मुझे उपदेश किया है; क्योंकि अब आपको देखकर ये इस प्रकार काँपते हुए-से दिखायी देते हैं, जब कि पहले ये अन्य प्रकारके थे' इस प्रकार काकुवचन ( व्यङ्ग्योक्ति ) के द्वारा उसने अग्नियोंको बतलाया। फिर 'हे सोम्य ! अग्नियोंने तुझे क्या बतलाया है ? इस प्रकार पूछे जानेपर 'यही कहा है' |

खण्ड १४]शाङ्करभाष्यार्थ४१९

| जज्ञे प्रतिज्ञातवान्प्रतीकमात्रं किञ्चिन्न सर्वं यथोक्तमग्निभिरुक्तमवोचत् ।<br><br>यत आहाचार्यो लोकान्वाव पृथिव्यादीन्हे सोम्य किल तेऽवोचन्न ब्रह्म साकल्येन । अहं तु ते तुभ्यं तद्ब्रह्म यदिच्छसि त्वं श्रोतुं वक्ष्यामि, शृणु तस्य मयोच्यमानस्य ब्रह्मणो ज्ञानमाहात्म्यम्—यथा पुष्करपलाशे पद्मपत्र आपो न श्लिष्यन्त एवं यथा वक्ष्यामि ब्रह्मैवंविवि पापं कर्म न श्लिष्यते न संबध्यत इत्येवमुक्तवत्याचार्य आहोपकोसलो ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाचार्यः ॥ २-३ ॥ | ऐसा कहा, अर्थात् कुछ प्रतीकमात्र ही बतलाया, अग्नियोंका कहा हुआ सारा उपदेश यथावत् नहीं कहा ।<br><br>अतः आचार्यने कहा—'हे सोम्य ! अग्नियोंने तुझे पृथिवी आदि लोक ही बतलाये हैं, ब्रह्मका पूर्णतया उपदेश नहीं किया । अब मैं तुझे उस ब्रह्मका उपदेश करूँगा, जिसे कि तू सुनना चाहता है । मेरेद्वारा कहे जाते हुए उस ब्रह्मके ज्ञानका माहात्म्य सुन—जिस प्रकार पुष्कर-पलाश—कमलपत्रमें जल श्लिष्ट-सम्बद्ध नहीं होता उसी प्रकार जैसे ब्रह्मका मैं उपदेश करूँगा उसे जाननेवालेमें पापकर्मका सम्बन्ध नहीं होता ।' आचार्यके इस प्रकार कहनेपर उपकोसलने कहा—'भगवान् मुझे बतलावें ।' तब आचार्य उससे बोले ॥ २-३ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥

छा० उ० १४—

पञ्चदश खण्ड

आचार्यका उपदेश—नेत्रस्थित पुरुषकी उपासना

य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति । तद्यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति ॥ १ ॥

‘यह जो नेत्रमें पुरुष दिखाई देता है यह आत्मा है’—ऐसा उसने कहा ‘यह अमृत है, अभय है और ब्रह्म है।’ उस (पुरुषके स्थानरूप नेत्र) में यदि घृत या जल डाले तो वह पलकोंमें ही चला जाता है ॥१॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते निवृत्तचक्षुर्भिर्रह्मचर्यादिसाधनसंपन्नैः शान्तैर्विवेकिभिर्दृष्टेर्द्रष्टा, “चक्षुषश्चक्षुः” (के०उ० १।२) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् ।‘जिनका बाह्य इन्द्रियग्राम निवृत्त हो गया है उन ब्रह्मचर्यादि साधन-सम्पन्न, शान्तात्मा विवेकियोंद्वारा जो यह नेत्रके अन्तर्गत दृष्टिका द्रष्टा पुरुष देखा जाता है, जैसा कि “वह चक्षुओंका चक्षु है” ऐसी अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है’ [वह प्राणियोंका आत्मा है—ऐसा आचार्यने कहा ।]
नन्वग्निभिरुक्तं वितथं यत आचार्यस्तु ते गतिं वक्तेति गतिमात्रस्य वक्तेत्यवोचन्भविष्यद्विषयापरिज्ञानं चाग्नीनाम् ।शङ्का—[आचार्यके इस कथनसे अग्नियोंका कथन मिथ्या प्रमाणित होता है, क्योंकि उन्होंने तो ‘आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता’ ऐसा कहकर ‘केवल गतिमात्र कहलावेंगे’ इतना ही कहा था। तथा इससे अग्नियोंका भविष्यद्विषयसम्बन्धी ज्ञान न होना सिद्ध होता है ।

खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ ४२१

| नैष दोषः; सुखाकाशस्यैवाक्षिणि दृश्यत इति द्रष्टुरनुवादात् । एष आत्मा प्राणिनामिति होवाचैवमुक्तवानेतद्यदेवात्मतत्त्वमवोचाम एतदमृतममरणधर्म्यविनाशयत एवाभयं यस्य हि विनाशाशङ्का तस्य भयोपपत्तिस्तदभावादभयमत एवैतद्ब्रह्म बृहदनन्तमिति ।<br><br>किञ्चास्य ब्रह्मणोऽक्षिपुरुषस्य माहात्म्यं तत्तत्र पुरुषस्य स्थानेऽक्षिणि यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति पक्ष्मावेव गच्छति न चक्षुषा संबध्यते पद्मपत्रेणेवोदकम् । स्थानस्याप्येतन्माहात्म्यं किं पुनः स्थानिनोऽक्षिपुरुषस्य निरञ्जनत्वं वक्तव्यमित्यभिप्रायः ॥ १ ॥ | समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि ऐसा कहकर आचार्यने [ अग्नियोंके बतलाये हुए ] सुखाकाशरूप द्रष्टाका ही 'जो नेत्रमें दिखायी देता है' इस प्रकार अनुवाद किया है । यह प्राणियोंका आत्मा है 'इति होवाच'—इस प्रकार कहा । जिस आत्मतत्त्वका वर्णन हम पहले कर चुके हैं वही यह अमृत—अमरणधर्मा यानी अविनाशी है; इसीसे अभय भी है, क्योंकि जिसके नाशकी शङ्का होती है उसीको भय हो सकता है; अतः उसका अभाव होनेके कारण यह अभय है । इसीसे यह ब्रह्म—बृहत् यानी अनन्त है ।<br><br>तथा इस ब्रह्म—नेत्रस्थ पुरुषका ऐसा माहात्म्य है कि इस रुषके स्थानभूत नेत्रमें यदि घृत या जल डाला जाय तो वह इधर-उधर पलकोंमें ही चला जाता है; पद्मपत्र-से जलके समान नेत्रसे उसका सम्बन्ध नहीं होता। जब कि स्थानका भी ऐसा माहात्म्य है तो स्थानी नेत्रस्थ पुरुषकी निःसङ्गताके विषयमें तो कहना ही क्या है ? यह इसका अभिप्राय है ॥ १ ॥ |

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४२२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

४२२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

एतँसंयद्वाम इत्याचक्षत एतँहि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति सर्वाण्येनं वामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद ॥२॥

इसे 'संयद्वाम' ऐसा कहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण सेवनीय वस्तुएँ सब ओरसे इसे ही प्राप्त होती हैं; जो इस प्रकार जानता है उसे सम्पूर्ण सेवनीय वस्तुएँ सब ओरसे प्राप्त होती हैं ॥ २ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एतं यथोक्तं पुरुषं संयद्वाम इत्याचक्षते। कस्मात्? यस्मादेतं सर्वाणि वामानि वननीयानि संभजनीयानि शोभनान्यभिसंयन्त्यभिसंगच्छन्तीत्यतः संयद्वामः। तथैवंविदमेनं सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद ॥ २ ॥इस पूर्वोक्त पुरुषको 'संयद्वाम' ऐसा कहते हैं। क्यों? क्योंकि सम्पूर्ण वाम—वननीय-सम्भजनीय अर्थात् शोभन पदार्थ सब ओरसे इसे ही प्राप्त होते हैं, इसलिये यह संयद्वाम है। इसी प्रकार ऐसा जाननेवाले पुरुषको—जो इसे ऐसा जानता है उसे, सम्पूर्ण सेवनीय पदार्थ सब ओरसे प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥
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एष उ एव वामनीरेष हि सर्वाणि वामानि नयति सर्वाणि वामानि नयति य एवं वेद ॥ ३ ॥

यही वामनी है, क्योंकि यही सम्पूर्ण वामोंका वहन करता है। जो ऐसा जानता है वह सम्पूर्ण वामोंको वहन करता है ॥ ३ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एष उ एव वामनीर्यस्मादेष हि सर्वाणि वामानि पुण्यकर्मफलानि पुण्यानुरूपं प्राणिभ्यो नयति प्रापयति वहति चात्मधर्मत्वेन। विदुषः फलं सर्वाणियही वामनी है, क्योंकि यही अपने धर्मरूपसे प्राणियोंके प्रति उनके पुण्यानुसार सम्पूर्ण वाम—पुण्य कर्मफलोंका वहन करता है। इसके विद्वान्को मिलनेवाला फल—जो ऐसा जानता है वह सम्पूर्ण

खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२३ ЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖ

वामानि नयति य एवं वेद ॥३॥वामोंका (पुण्यकर्मफलोंका) वहन करता है ॥ ३ ॥

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एष उ एव भामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद ॥ ४ ॥

यही भामनी है, क्योंकि यही सम्पूर्ण लोकोंमें भासमान होता है। जो ऐसा जानता है वह सम्पूर्ण लोकोंमें भासमान होता है ॥ ४ ॥

एष उ एव भामनीरेष हि यस्मात्सर्वेषु लोकेष्वादित्यचन्द्राग्न्यादिरूपैर्भाति दीप्यते । “तस्य भासा सर्वमिदं विभाति” (क० उ० ५।१६) इति श्रुतेः; अतो भामानि नयतीति भामनीः । य एवं वेदासावपि सर्वेषु लोकेषु भाति ॥ ४ ॥यही भामनी है, क्योंकि सम्पूर्ण लोकोंमें आदित्य, चन्द्र और अग्नि आदिके रूपोंमें यही भासमान—दीप्त होता है। “उसीके प्रकाशसे यह सब प्रकाशित है” इस श्रुतिसे यही सिद्ध होता है। अतः भामों (प्रकाशों) का वहन करता है इसलिये भामनी है। जो ऐसा जानता है वह भी सम्पूर्ण लोकमें भासमान होता है ॥ ४ ॥

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ब्रह्मवेत्ताकी गति

अथ यदु चैवास्मिञ्छव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेवाभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमपूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासांस्तान्यासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते नावर्तन्ते ॥ ५ ॥

४२४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४

४२४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४

अब [श्रुति पूर्वोक्त ब्रह्मवेत्ताकी गति बतलाती है—] इसके लिये शवकर्म करें अथवा न करें, वह अर्चिरभिमानी देवताको ही प्राप्त होता है। फिर अर्चिरभिमानी देवतासे दिवसाभिमानी देवताको, दिवसाभिमानीसे शुक्लपक्षाभिमानी देवताको और शुक्लपक्षाभिमानी देवतासे उत्तरायणके छः मासोंको प्राप्त होता है। मासोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे आदित्यको, आदित्यसे चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होता है। वहाँसे अमानव पुरुष इन्हें ब्रह्मको प्राप्त करा देता है। यह देवमार्ग-ब्रह्ममार्ग है। इससे जानेवाले पुरुष इस मानवमण्डलमें नहीं लौटते नहीं; लौटते ॥ ५ ॥

| अथेदानीं यथोक्तब्रह्मविदो गतिरुच्यते-यद् यदि उचैवास्मिन्नेवंविदि शव्यं शवकर्म मृते कुर्वन्ति यदि च न कुर्वन्ति ऋत्विजः सर्वथाप्येवंविन्नेन शवकर्मणाकृतेनापि प्रतिबद्धो न न ब्रह्म प्राप्नोति न च कृतेन शवकर्मणास्य कश्चनाभ्यधिको लोकः। “न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्” (बृ०उ० ४।४।२३) इति श्रुत्यन्तरात्। <br><br> शवकर्मण्यनादरं दर्शयन्विद्यां स्तौति न पुनः शवकर्मैवंविदो न कर्तव्यमिति। अक्रिय- | अब उपर्युक्त ब्रह्मवेत्ताकी गति बतलायी जाती है—इस प्रकार जाननेवाले इस उपासकके लिये उसकी मृत्यु होनेपर ऋत्विग्गण शवकर्म करें अथवा न करें उस शवकर्मके न करनेसे भी इस प्रकार जाननेवाला वह उपासक सर्वथा प्रतिबद्ध होकर ब्रह्मको प्राप्त न होता हो—ऐसा नहीं होता और न उस शवकर्मके करनेसे इसे कोई ब्रह्मसे उत्कृष्टलोक ही प्राप्त होता है; जैसा कि “यह कर्मसे न तो बढ़ता है और न घटता ही है” इस एक अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है। <br><br> शवकर्मके प्रति अनादर प्रदर्शित करता हुआ यह मन्त्र केवल विद्याकी स्तुति करता है, इस प्रकार जाननेवालेका शवकर्म नहीं करना चाहिये—यह नहीं बतलाता। इस |

खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
माणे हि शवकर्माणि कर्मणां फलारम्भे प्रतिबन्धः कश्चिदनुमीयतेऽन्यत्र; यत इह विद्याफलारम्भकाले शवकर्म स्याद्वा न वेति विद्यावतोऽप्रतिबन्धेन फलारम्भं दर्शयति। ये सुखाकाशमक्षिस्थं संयद्वामो वामनीर्भामिनीरित्येवंगुणमुपासते प्राणसहितामग्निविद्यां च, तेषामन्यत् कर्म भवतु मा वा भूत्सर्वथापि तेऽर्चिषमेवाभिसंभवन्त्यर्चिरभिमानिनीं देवतामभिसंभवन्ति प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः। <br><br> अर्चिषोऽर्चिर्देवताया अहरहरभिमानिनीं देवतामह्न आपूर्यमाणपक्षं शुक्लपक्षदेवतामापूर्यमाणपक्षाद्यान्षण्मासानुदङ्ङुत्तरां दिशमेति सविता तान्मासानुत्तरायणदेवतां तेभ्यो मासेभ्यःविद्वान्‌के सिवा अन्य किसीके लिये तो शवकर्म न करनेपर उसके कर्मफलके आरम्भमें कुछ प्रतिबन्ध होनेका अनुमान किया जाता है; क्योंकि यहाँ श्रुति उपासनाका फल आरम्भ होनेके समय केवल उपासकके लिये ही—उसका शवकर्म किया जाय अथवा न किया जाय—अप्रतिबन्धपूर्वक फलका आरम्भ दिखलाती है। जो लोग नेत्रमें स्थित संयद्वाम, वामनी और भामनी इत्यादि गुणोंसे युक्त सुखाकाशकी उपासना करते हैं तथा प्राणसहित अग्निविद्याकी उपासना करते हैं—उनका अन्य कर्म हो अथवा न हो—वे सर्वथा अर्चिरभिमानी देवताको ही प्राप्त होते हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है। <br><br> अर्चिः—अर्चिरभिमानी देवतासे अहः—अहरभिमानी (दिवसाभिमानी) देवताको, अहरभिमानी देवतासे आपूर्यमाण पक्ष—शुक्लपक्षदेवताको, शुक्लपक्षसे षडुदङ्—जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तर दिशामें चलता है उन महीनोंको अर्थात् उत्तरायण-देवताको, उन उत्तरायणके छः महीनोंसे संवत्सर—संवत्सरा-

४२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

४२६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| संवत्सरं संवत्सरदेवतां ततः संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्तत्प्रस्थांस्तान् पुरुषः कश्चिद्ब्रह्मलोकादेत्यामानवो मानव्यां सृष्टौ भवो मानवो न मानवोऽमानवः स पुरुष एनान्ब्रह्म सत्यलोकस्थं गमयति गन्तृगन्तव्यगमयितृत्वव्यपदेशेभ्यः । सन्मात्रब्रह्मप्राप्तौ तदनुपपत्तेः । ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येतीति हि तत्र वक्तुं न्याय्यम् । सर्वभेदनिरासेन सन्मात्रप्रतिपत्तिं वक्ष्यति । न चादृष्टो मार्गोऽग- | भिमानी देवताको प्राप्त होते हैं । फिर संवत्सरसे आदित्यको, आदित्यसे चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होते हैं । वहाँ स्थित हुए उन उपासकोंको कोई अमानव—जो मानवी सृष्टिमें होता है उसे 'मानव' कहते हैं जो मानव न हो उसीका नाम 'अमानव' है; ऐसा कोई अमानव पुरुष ब्रह्मलोकसे आकर सत्यलोकमें स्थित ब्रह्मके पास पहुँचा देता है,। गमन करनेवाले, गन्तव्य स्थान और गमन करानेवालेका उल्लेख होनेके कारण [ यहाँ कार्यब्रह्म ही अभिप्रेत है ] क्योंकि सन्मात्र ब्रह्मकी प्राप्तिमें यह कुछ नहीं कहा जा सकता । वहाँ तो यही कहना न्याय्य है कि 'वह ब्रह्मरूप हुआ ही ब्रह्मको प्राप्त होता है'। आगे छठे (अध्यायमें) श्रुति सम्पूर्ण भेदके बाधद्वारा सन्मात्र ब्रह्मकी प्राप्तिका उल्लेख करेगी ।* तथा बिना देखा हुआ [ एकत्वरूप ] मार्ग तो मोक्षमें उपयोगी ही नहीं हो सकता । जैसा कि |


* यहाँ यह शङ्का होती है कि जब परमार्थतः जीव ब्रह्म ही है तो ब्रह्मके उपासकका भी लोकान्तरमें जाना ठीक नहीं है । उसका भी मोक्ष ही हो जाना चाहिये । इसका समाधान करनेके लिये आगेकी बात कहते हैं ।

खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२७


संस्कृत भाष्यहिन्दी भाष्यार्थ
सनायोपतिष्ठते । “स एनमविदितो न भुनक्ति” इति श्रुत्यन्तरात् ।“वह (परमात्मा) विदित न होनेपर इस अधिकारीका [मुक्ति प्रदान करके] पालन नहीं करता” इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है ।
एष देवपथः, देवैरर्चिरादिभिर्गमयितृत्वेनाधिकृतैरुपलक्षितः पन्था देवपथ उच्यते । ब्रह्म गन्तव्यं तेन चोपलक्षित इति ब्रह्मपथः । एतेन प्रतिपद्यमाना गच्छन्तो ब्रह्मेमं मानवं मनुसंबन्धिनं मनोः सृष्टिलक्षणमावर्तं नावर्तन्त आवर्तन्तेऽस्मिञ्जनन-मरणप्रबन्धचक्रारूढा घटीयन्त्र-वत्पुनः पुनरित्यावर्तस्तं न प्रति-पद्यन्ते । नावर्तन्त इति द्विरुक्तिः सफलाया विद्यायाः परिसमाप्ति-प्रदर्शनार्था ॥ ५ ॥यह देवमार्ग है—उपासकको पहुँचानेके लिये अधिकारप्राप्त देवताओंसे उपलक्षित होनेके कारण यह मार्ग देवमार्ग कहलाता है, तथा ब्रह्म गन्तव्य (प्राप्तव्य) स्थान है, उससे उपलक्षित होता है, इसलिये वह ब्रह्ममार्ग है । इसके द्वारा ब्रह्मको प्राप्त हुए अर्थात् जानेवाले उपासक इस मानव—मनुसम्बन्धी अर्थात् मनुकी सृष्टिरूप आवर्तमें नहीं लौटते । जिसमें जन्म-मरणके प्रवाहरूप चक्रपर चढ़े हुए प्राणी घटीयन्त्रके समान पुनः-पुनः आवर्तन करते हैं उस इस लोकको 'आवर्त' कहते हैं, इसे वे प्राप्त नहीं होते । ‘नावर्तन्ते नावर्तन्ते’ यह द्विरुक्ति फलके सहित विद्याकी परिसमाप्ति प्रदर्शित करनेके लिये है ॥ ५ ॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥

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षोडश खण्ड

यज्ञोपासना

रहस्यप्रकरणे प्रसङ्गादारण्यकत्वसामान्याच्च यज्ञे क्षत उत्पन्ने व्याहृतयः प्रायश्चित्तार्था विधातव्यास्तदभिज्ञस्य चर्त्विजो ब्रह्मणो मौनमित्यत इदमारभ्यते—रहस्य (उपासना) के प्रकरणमें [मार्गोपदेशका] प्रसङ्ग होनेके कारण, [पूर्वोत्तर प्रकरणोंका] आरण्यकत्वमें सादृश्य होनेके कारण, और यज्ञमें कोई क्षत प्राप्त होनेपर उसके प्रायश्चित्तके लिये व्याहृतियोंका विधान करना है—तथा प्रायश्चित्तको जाननेवाले ऋत्विक् ब्रह्माके लिये मौनका विधान करना है—इसलिये यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है—

एष ह वै यज्ञो योऽयं पवत एष ह यन्निदꣳसर्वं पुनाति। यदेष यन्निदꣳसर्वं पुनाति तस्मादेष एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक्च वर्तनी ॥ १ ॥

यह जो चलता है निश्चय यज्ञ ही है। यह चलता हुआ निश्चय इस सम्पूर्ण जगत्‌को पवित्र करता है; क्योंकि यह गमन करता हुआ इस समस्त संसारको पवित्र कर देता है इसलिये यही यज्ञ है। मन और वाक्—ये दोनों इसके मार्ग हैं ॥ १ ॥

एष ह वा एष वायुर्योऽयं पवतेऽयं यज्ञः। ह वा इति प्रसिद्धार्थावद्योतकौ निपातौ। वायुप्रतिष्ठो हि यज्ञः प्रसिद्धः‘एष ह वै’—यह वायु जो कि चलता है, यज्ञ है। ‘ह’ और ‘वै’ ये प्रसिद्ध पदार्थके द्योतक निपात हैं। श्रुतियोंमें यह वायुरूप प्रतिष्ठावाला ही प्रसिद्ध है। जैसा कि

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थं ४२९


| श्रुतिषु, "स्वाहा वाते धाः"¹ (यजु० २।२१ तथा ८।२१) "अयं वै यज्ञो योऽयं पवते" इत्यादिश्रुतिभ्यः । वात एव हि चलनात्मकत्वात्क्रियासमवायी । "वात एव यज्ञस्यारम्भको वातः प्रतिष्ठा" इति च श्रवणात् । | "यह यज्ञ आपके हाथमें सौंपता हूँ। आप इसे वायु देवतामें स्थापित करें।" "यह निश्चय यज्ञ ही है जो कि चलता है" इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है। चलनात्मक स्वरूप गुणवाला होनेके कारण वायुका ही क्रियासे समवाय-सम्बन्ध है; जैसा कि श्रुति कहती है—"वायु ही यज्ञका आरम्भक है और वायु ही उसकी प्रतिष्ठा है।" | | एष ह यन्गच्छंश्चलन्निदं सर्वं जगत्पुनाति पावयति शोधयति । न ह्यचलतः शुद्धिरस्ति । दोष-निरसनं चलतो हि दृष्टं न स्थिरस्य । यद्यस्माच्च यन्नेषदं सर्वं पुनाति यस्मादेष एव यज्ञो यत्पुनातीति । | यह चलता—गमन करता हुआ इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र—शुद्ध कर देता है। जो नहीं चलता [ अर्थात् विहित क्रियाका अनुष्ठान नहीं करता ] उसकी शुद्धि नहीं होती। दोषनिवृत्ति गतिशीलकी ही देखी जाती है, स्थिरकी नहीं देखी जाती; क्योंकि यह चलता हुआ इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र कर देता है इसलिये यही यज्ञ है, क्योंकि पवित्र करता है। | | तस्यास्यैवं विशिष्टस्य यज्ञस्य वाक्च मन्त्रोच्चारणे व्यापृता, मनश्च यथाभूतार्थज्ञाने व्यापृतम्, ते एते वाङ्मनसे वर्तनी मार्गों | उस इस प्रकारकी विशेषता-वाले यज्ञके मन्त्रोच्चारणमें प्रवृत्त वाणी और यथार्थ वस्तुके ज्ञानमें प्रवृत्त मन---ये दोनों अर्थात् वाणी और मन 'वर्तनी'--मार्ग हैं। जिन- |


१ इस मन्त्रकी एक अर्धाली इस प्रकार है- 'मनसस्पत इमं देव यज्ञँ स्वाहा वाते धाः' अर्थात् 'हे चित्तके प्रवर्तक देव (परमेश्वर)! मैं यह यज्ञ आपके हाथोंमें सौंपता हूँ, आप इसे वायु देवतामें स्थापित करें।'

४३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

४३०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| याभ्यां यज्ञस्तायमानः प्रवर्तते ते वर्तनी। "प्राणापानपरिचलनवत्या हि वाचश्चित्तस्य चोत्तरोत्तरक्रमो यद्यज्ञः" इति हि श्रुत्यन्तरम् । अतो वाङ्मनसाभ्यां यज्ञो वर्तते इति वाङ्मनसे वर्तनी उच्येते यज्ञस्य ॥ १ ॥ | के द्वारा विस्तृत किया हुआ यज्ञ प्रवृत्त होता है उन्हें 'वर्तनी' कहते हैं। "प्राण और अपान इन दोनोंके योगसे जिनका परिचलन होता है। उन वाणी और मनका जो पूर्वापरक्रम¹ है वही यज्ञ है"—ऐसी एक दूसरी श्रुति कहती है। इस प्रकार क्योंकि वाणी और मनसे यज्ञ प्रवृत्त होता है, इसलिये वाणी और मन यज्ञके मार्ग कहे गये हैं ॥ १ ॥ |

ब्रह्माके मौनभङ्गसे यज्ञकी हानि

तयोरन्यतरां मनसा संस्करोति ब्रह्मा वाचा होताध्वर्यु रुद्गातान्यतराꣳस यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदति ॥ २ ॥ अन्यतरामेव वर्तनीꣳसंस्करोति हीयतेऽन्यतरा स यथैकपादद्व्रजन्रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यत्येवमस्य यज्ञो रिष्यति यज्ञꣳरिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति स इष्ट्वा पापीयान् भवति ॥ ३ ॥

उनमेंसे एक मार्गका ब्रह्मा मनके द्वारा संस्कार करता है तथा होता, अध्वर्यु और उद्गाता ये वाणी द्वारा दूसरे मार्गका संस्कार करते हैं। यदि प्रातरनुवाकके आरम्भ हो जानेपर परिधानीया ऋचाके उच्चारणसे पूर्व ब्रह्मा बोल उठता है तो वह केवल एक मार्गका ही संस्कार करता


१. क्योंकि मनसे चिन्तन करके वाणीसे उच्चारण करनेवाला पुरुष ही इनके पूर्वापरभावरूप क्रमपूर्वक यज्ञ-सम्पादन करता है।

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३१


है, दूसरा मार्ग नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार एक पाँवसे चलनेवाला पुरुष अथवा एक पहियेसे चलनेवाला रथ नष्ट हो जाता है उसी प्रकार इसका यज्ञ भी नाशको प्राप्त हो जाता है। यज्ञके नष्ट होनेके पश्चात् यजमानका नाश होता है; इस प्रकारका यज्ञ करनेपर वह और भी अधिक पापी हो जाता है ॥ २-३ ॥

| तयोर्वर्त्तन्योरन्यतरां वर्त्तनीं मनसा विवेकज्ञानवता संस्करोति ब्रह्मर्त्विग्वाचा वर्त्तन्या होताध्वर्यु रुद्गातेत्येते त्रयोऽप्यृत्विजोऽन्यतरां वाग्लक्षणां वर्त्तनीं वाचैव संस्कुर्वन्ति । तत्रैवं सति वाङ्मनसे वर्त्तनी संस्कार्ये यज्ञे । | उन दोनों मागोंमेंसे किसी एक मार्गका ब्रह्मनामक ऋत्विक् विवेकज्ञानयुक्त चित्तद्वारा संस्कार करता है तथा होता, अध्वर्यु और उद्गाता ये तीनों ऋत्विक् भी दूसरे वाक्नामक मार्गका वाणीके द्वारा ही संस्कार करते हैं। अतः ऐसा होनेके कारण यज्ञमें वाक् और मन दोनों ही मागोंका संस्कार करना चाहिये। | | अथ स ब्रह्मा यत्र यस्मिन्काल उपाकृते प्रारब्धे प्रातरनुवाके शस्त्रे पुरा पूर्वं परिधानीयाया ऋचो ब्रह्मैतस्मिन्नन्तरे काले व्यववदति मौनं परित्यजति यदि तदान्यतरामेव वाग्वर्त्तनीं संस्करोति । ब्रह्मणासंस्क्रियमाणा मनोवर्त्तनी हीयते विनश्यति छिद्रीभवत्यन्यतरा, स यज्ञो वाग्वर्त्तन्यैवान्यतरया वर्तितुमशक्नुवन्निष्यति । | इसके बाद यह ब्रह्मा जिस कालमें प्रातरनुवाक शस्त्रका प्रारम्भ हो गया हो उस समयसे परिधानीया ऋचाके उच्चारणसे पूर्व बोल उठता है—यदि मौन छोड़ देता है तो एक अर्थात् वाक्रूप मार्गका ही संस्कार करता है। इस प्रकार ब्रह्माद्वारा संस्कारशून्य हुआ एक मनरूप मार्ग विनष्ट अर्थात् छिद्रयुक्त हो जाता है। तब वह यज्ञ एकमात्र वाग्वर्त्तनीसे ही रहनेमें असमर्थ होनेके कारण नष्ट हो जाता है। |

४३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

४३२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| कथमिव ? इत्याह—स यथैकपात्पुरुषो व्रजन्गच्छन्नध्वानं रिष्यति, रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो गच्छन्निरिष्यति, एवमस्य यजमानस्य कुब्रह्मणा यज्ञो रिष्यति विनश्यति । यज्ञं रिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति; यज्ञप्राणो हि यजमानः, अतो युक्तो यज्ञरेषे रेषस्तस्य । स तं यज्ञमिष्ट्वा तादृशं पापीयान्पापतरो भवति ॥ २-३ ॥ | किस प्रकार नष्ट हो जाता है ? यह श्रुति बतलाती है—जिस प्रकार मार्गमें एक पाँवसे चलनेवाला मनुष्य गिर जाता है अथवा एक पहियेसे चलनेवाला रथ नाशको प्राप्त होता है उसी प्रकार कुत्सित ब्रह्माके द्वारा इस यजमानका यज्ञ नष्ट हो जाता है। यज्ञके नष्ट होनेके पश्चात् यजमानका भी नाश होता है, क्योंकि यजमानका तो यज्ञ ही प्राण है, इसलिये यज्ञके नाश होनेपर उसका नाश होना उचित ही है। वह इस प्रकारके उस यज्ञका यजन करनेपर पापीयान्—अधिकतर पापी होता है ॥ २-३ ॥ |

ब्रह्माके मौनपालनसे यज्ञकी प्रतिष्ठा

अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदत्युभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा ॥ ४ ॥ स यथोभयपाद्व्रजन्नरथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान् भवति ॥ ५ ॥

और यदि प्रातरनुवाकका आरम्भ होनेके अनन्तर परिधानीया ऋचासे पूर्व ब्रह्मा नहीं बोलता है तो [ समस्त ऋत्विक् मिलकर ] दोनों ही मार्गोंका संस्कार कर देते हैं । तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं होता । जिस प्रकार दोनों पैरोंसे चलनेवाला पुरुष अथवा दोनों पहियोंसे चलने-

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३३


वाला रथ स्थित रहता है इसी प्रकार इसका यज्ञ स्थित रहता है, यज्ञके स्थित रहनेपर यजमान भी स्थित रहता है। वह [ऐसा] यज्ञ करके श्रेष्ठ होता है ॥ ४-५ ॥

| अथ पुनर्यत्र ब्रह्मा विद्वान्मौनं परिगृह्य वाग्विसर्गमकुर्वन्वर्तते यावत्परिधानीयाया न व्यववदति तथैव सर्वर्त्विज उभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरापि। किमिव ? इत्याह पूर्वोक्तविपरीतौ दृष्टान्तौ। एवमस्य यजमानस्य यज्ञः स्ववर्तनीभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठति स्वेनात्मनाविनश्यन्वर्तत इत्यर्थः। यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति। स यजमान एवं मौनविज्ञानवद्ब्रह्मोपेतं यज्ञमिष्ट्वा श्रेयानम्भवति श्रेष्ठो भवतीत्यर्थः ॥४-५॥ | किन्तु जहाँ विद्वान् ब्रह्मा मौन ग्रहण करनेके अनन्तर परिधानीया ऋचापर्यन्त वाणी उच्चारण न करता हुआ रहता है, मौन त्याग नहीं करता; और उसीकी तरह अन्य सब ऋत्विक् भी [नियमबद्ध] रहते हैं, वहाँ वे सब दोनों ही मार्गोंका संस्कार कर देते हैं। तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं होता। किस प्रकार नष्ट नहीं होता, इसमें श्रुति पहलेसे विपरीत दृष्टान्त देती है। तात्पर्य यह है कि उसी प्रकार अपने दोनों मार्गोंद्वारा स्थित हुआ इस यजमानका यज्ञ प्रतिष्ठित होता है, अर्थात् अपने स्वरूपसे भ्रष्ट न होता हुआ वर्तमान रहता है। यज्ञके प्रतिष्ठित रहनेपर यजमान भी उसीकी तरह प्रतिष्ठित रहता है। इस प्रकारके मौन-विज्ञानयुक्त ब्रह्मावाला वह यजमान यज्ञ करके श्रेयान् होता है अर्थात् श्रेष्ठ होता है ॥ ४-५ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥

सप्तदश खण्ड

यज्ञ-दोषके प्रायश्चित्तरूपसे व्याहृतियोंकी उपासना

अत्र ब्रह्मणो मौनं विहितम्; तद्रेषे ब्रह्मत्वकर्मणि चाथान्यस्मिंश्च हौत्रादिकर्मरेषे व्याहृतिहोमः प्रायश्चित्तमिति तदर्थं व्याहृतयो विधातव्या इत्याह-यहाँ ब्रह्माके मौनका विधान किया गया, उसका भ्रंश होनेपर ब्रह्मत्व कर्मका विनाश होने अथवा अन्य किसी हौत्रादि कर्मका विनाश होनेपर व्याहृतिहोम यह प्रायश्चित्त है; उसके लिये व्याहृतियोंका विधान करना है, इसलिये श्रुति कहती है-

प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेषां तप्यमानानाँ रसान् प्रावृहदग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षादादित्यं दिवः ॥ १॥

प्रजापतिने लोकोंको लक्ष्य बनाकर ध्यानरूप तप किया। उन तप किये जाते हुए लोकोंसे उसने रस निकाले। पृथिवीसे अग्नि, अन्तरिक्षसे वायु और द्युलोकसे आदित्यको उद्धृत किया ॥ १ ॥

प्रजापतिर्लोकानभ्यतपल्लोकानुद्दिश्य तत्र सारजिघृक्षया ध्यानलक्षणं तपश्चकार। तेषां तप्यमानानां लोकानां रसान्साररूपान्प्रावृहदुद्धृतवाञ्जग्राहेत्यर्थः।<br><br>कान् ? अग्निं रसं पृथिव्याः,प्रजापतिने लोकोंको अर्थात् लोकोंको लक्ष्य बनाकर उनसे सार ग्रहण करने की इच्छासे ध्यानरूप तप किया। इस प्रकार तप किये जाते हुए उन लोकोंके साररूप रसोंको 'प्रावृहत्' — उद्धृत अर्थात् ग्रहण किया। किन रसोंको ग्रहण किया ? पृथिवीसे अग्निरूप रस

खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थं ४३५


| वायुमन्तरिक्षात्, आदित्यं दिवः ॥ १ ॥ | अन्तरिक्षसे वायुरूप रस और द्युलोक-से आदित्यरूप रस ग्रहण किया ॥ १ ॥ |


स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत्तासां तप्यमानानाँ रसान्प्रावृहदग्नेर्ऋचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् ॥ २ ॥

[ फिर ] उसने इन तीन देवताओंको लक्ष्य करके तप किया । उन तप किये जाते हुए देवताओंसे उसने रस निकाले । अग्निसे ऋक्, वायुसे यजुः और आदित्यसे साम ग्रहण किये ॥ २ ॥

| पुनरप्येवमेवाग्न्याद्याः स एतास्तिस्रो देवता उद्दिश्याभ्यतपत् । ततोऽपि सारं रसं त्रयी-विद्यां जग्राह ॥ २ ॥ | फिर भी उसी प्रकार उसने अग्नि आदि तीन देवताओंको लक्ष्य बनाकर तप किया । उनसे भी त्रयी-विद्यारूप सार—रस ग्रहण किया ॥ २ ॥ |

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स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत्तस्यास्तप्यमानाया रसान्प्रावृहद्भूरित्यृग्भ्यो भुवरिति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ॥ ३ ॥ तद्यदृक्तो रिष्येद्भूः स्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयादृचामेव तद्रसेनर्चां वीर्येणर्चां यज्ञस्य विरिष्टँ संदधाति ॥ ४ ॥

[ तदनन्तर ] उसने इस त्रयीविद्याको लक्ष्य करके तप किया । उस तप की जाती हुई विद्यासे उसने रस निकाले । ऋक् श्रुतियोंसे भूः, यजुःश्रुतियोंसे भुवः तथा सामश्रुतियोंसे स्वः इन रसोंको ग्रहण किया । उस यज्ञमें यदि ऋक श्रुतियोंके सम्बन्धसे क्षत हो तो 'भूः स्वाहा' ॥ ऐसा कहकर गार्हपत्याग्निमें हवन करे । इस प्रकार वह ऋचाओंके रससे ऋचाओंके वीर्यद्वारा ऋक्सम्बन्धी यज्ञके क्षतको पूर्ति करता है ॥ ३-४ ॥

४३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

४३६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| स एतां पुनरभ्यतपत्तत्रयीं विद्याम्। तस्यास्तप्यमानाया रसं भूरिति व्याहृतिमृग्भ्यो जग्राह, भुवरिति व्याहृतिं यजुर्भ्यः, स्वरिति व्याहृतिं सामभ्यः। अतएव लोकदेववेदरसा महाव्याहृतयः अतस्तत्तत्र यज्ञे यद्युक्त ऋक्संबन्धादृङ्निमित्तं रिष्येद्यज्ञः क्षतं प्राप्नुयाद्भूःस्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयात्, सा तत्र प्रायश्चित्तिः। कथम् ? ऋचामेव, तदिति क्रियाविशेषणम्, रसेनर्चां वीर्येणौजसर्च्चां यज्ञस्य ऋक्संवन्धिनो यज्ञस्य विरिष्टं विच्छिन्नं क्षतरूपमुत्पन्नं संदधाति प्रतिसंधत्ते ॥ ३-४ ॥ | फिर उसने इस त्रयीविद्याको लक्ष्य करके तप किया । उस तप की जाती हुई विद्याके रस 'भूः' इस व्याहृतिको ऋक्श्रुतियोंसे ग्रहण किया । तथा 'भुवः' इस व्याहृतिको यजुःश्रुतियोंसे और 'स्वः' इस व्याहृतिको सामश्रुतियोंसे ग्रहण किया । इसीसे ये महाव्याहृतियाँ लोक, देव और वेदकी सारभूत हैं। इसलिये यदि उस यज्ञमें ऋक्से—ऋक् के सम्बन्धसे—ऋक् के कारण क्षत प्राप्त हो तो 'भूः स्वाहा' ऐसा कहकर गार्हपत्याग्निमें हवन करे। उस अवस्था में वही प्रायश्चित्त है। किस प्रकार ? ऋचाओंके ही रससे ऋचाओंके वीर्य-ओजद्वारा वह यज्ञके ऋक्-सम्बन्धी विरिष्ट—विच्छेद अर्थात् उत्पन्न हुए क्षतकी पूर्ति करता है। 'ऋचामेव तत्' इसमें 'तत्' यह क्रियाविशेषण है ॥ ३-४ ॥ |


अथ यदि यजुष्टो रिष्येद्भुवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयाद्यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरिष्टꣳसंदधाति ॥ ५ ॥