छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 432, कुल 978 में से
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षोडश खण्ड
यज्ञोपासना
| रहस्यप्रकरणे प्रसङ्गादारण्यकत्वसामान्याच्च यज्ञे क्षत उत्पन्ने व्याहृतयः प्रायश्चित्तार्था विधातव्यास्तदभिज्ञस्य चर्त्विजो ब्रह्मणो मौनमित्यत इदमारभ्यते— | रहस्य (उपासना) के प्रकरणमें [मार्गोपदेशका] प्रसङ्ग होनेके कारण, [पूर्वोत्तर प्रकरणोंका] आरण्यकत्वमें सादृश्य होनेके कारण, और यज्ञमें कोई क्षत प्राप्त होनेपर उसके प्रायश्चित्तके लिये व्याहृतियोंका विधान करना है—तथा प्रायश्चित्तको जाननेवाले ऋत्विक् ब्रह्माके लिये मौनका विधान करना है—इसलिये यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है— |
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एष ह वै यज्ञो योऽयं पवत एष ह यन्निदꣳसर्वं पुनाति। यदेष यन्निदꣳसर्वं पुनाति तस्मादेष एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक्च वर्तनी ॥ १ ॥
यह जो चलता है निश्चय यज्ञ ही है। यह चलता हुआ निश्चय इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करता है; क्योंकि यह गमन करता हुआ इस समस्त संसारको पवित्र कर देता है इसलिये यही यज्ञ है। मन और वाक्—ये दोनों इसके मार्ग हैं ॥ १ ॥
| एष ह वा एष वायुर्योऽयं पवतेऽयं यज्ञः। ह वा इति प्रसिद्धार्थावद्योतकौ निपातौ। वायुप्रतिष्ठो हि यज्ञः प्रसिद्धः | ‘एष ह वै’—यह वायु जो कि चलता है, यज्ञ है। ‘ह’ और ‘वै’ ये प्रसिद्ध पदार्थके द्योतक निपात हैं। श्रुतियोंमें यह वायुरूप प्रतिष्ठावाला ही प्रसिद्ध है। जैसा कि |
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