छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 433, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थं ४२९
| श्रुतिषु, "स्वाहा वाते धाः"¹ (यजु० २।२१ तथा ८।२१) "अयं वै यज्ञो योऽयं पवते" इत्यादिश्रुतिभ्यः । वात एव हि चलनात्मकत्वात्क्रियासमवायी । "वात एव यज्ञस्यारम्भको वातः प्रतिष्ठा" इति च श्रवणात् । | "यह यज्ञ आपके हाथमें सौंपता हूँ। आप इसे वायु देवतामें स्थापित करें।" "यह निश्चय यज्ञ ही है जो कि चलता है" इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है। चलनात्मक स्वरूप गुणवाला होनेके कारण वायुका ही क्रियासे समवाय-सम्बन्ध है; जैसा कि श्रुति कहती है—"वायु ही यज्ञका आरम्भक है और वायु ही उसकी प्रतिष्ठा है।" | | एष ह यन्गच्छंश्चलन्निदं सर्वं जगत्पुनाति पावयति शोधयति । न ह्यचलतः शुद्धिरस्ति । दोष-निरसनं चलतो हि दृष्टं न स्थिरस्य । यद्यस्माच्च यन्नेषदं सर्वं पुनाति यस्मादेष एव यज्ञो यत्पुनातीति । | यह चलता—गमन करता हुआ इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र—शुद्ध कर देता है। जो नहीं चलता [ अर्थात् विहित क्रियाका अनुष्ठान नहीं करता ] उसकी शुद्धि नहीं होती। दोषनिवृत्ति गतिशीलकी ही देखी जाती है, स्थिरकी नहीं देखी जाती; क्योंकि यह चलता हुआ इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र कर देता है इसलिये यही यज्ञ है, क्योंकि पवित्र करता है। | | तस्यास्यैवं विशिष्टस्य यज्ञस्य वाक्च मन्त्रोच्चारणे व्यापृता, मनश्च यथाभूतार्थज्ञाने व्यापृतम्, ते एते वाङ्मनसे वर्तनी मार्गों | उस इस प्रकारकी विशेषता-वाले यज्ञके मन्त्रोच्चारणमें प्रवृत्त वाणी और यथार्थ वस्तुके ज्ञानमें प्रवृत्त मन---ये दोनों अर्थात् वाणी और मन 'वर्तनी'--मार्ग हैं। जिन- |
१ इस मन्त्रकी एक अर्धाली इस प्रकार है- 'मनसस्पत इमं देव यज्ञँ स्वाहा वाते धाः' अर्थात् 'हे चित्तके प्रवर्तक देव (परमेश्वर)! मैं यह यज्ञ आपके हाथोंमें सौंपता हूँ, आप इसे वायु देवतामें स्थापित करें।'