छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 434, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| याभ्यां यज्ञस्तायमानः प्रवर्तते ते वर्तनी। "प्राणापानपरिचलनवत्या हि वाचश्चित्तस्य चोत्तरोत्तरक्रमो यद्यज्ञः" इति हि श्रुत्यन्तरम् । अतो वाङ्मनसाभ्यां यज्ञो वर्तते इति वाङ्मनसे वर्तनी उच्येते यज्ञस्य ॥ १ ॥ | के द्वारा विस्तृत किया हुआ यज्ञ प्रवृत्त होता है उन्हें 'वर्तनी' कहते हैं। "प्राण और अपान इन दोनोंके योगसे जिनका परिचलन होता है। उन वाणी और मनका जो पूर्वापरक्रम¹ है वही यज्ञ है"—ऐसी एक दूसरी श्रुति कहती है। इस प्रकार क्योंकि वाणी और मनसे यज्ञ प्रवृत्त होता है, इसलिये वाणी और मन यज्ञके मार्ग कहे गये हैं ॥ १ ॥ |
ब्रह्माके मौनभङ्गसे यज्ञकी हानि
तयोरन्यतरां मनसा संस्करोति ब्रह्मा वाचा होताध्वर्यु रुद्गातान्यतराꣳस यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदति ॥ २ ॥ अन्यतरामेव वर्तनीꣳसंस्करोति हीयतेऽन्यतरा स यथैकपादद्व्रजन्रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यत्येवमस्य यज्ञो रिष्यति यज्ञꣳरिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति स इष्ट्वा पापीयान् भवति ॥ ३ ॥
उनमेंसे एक मार्गका ब्रह्मा मनके द्वारा संस्कार करता है तथा होता, अध्वर्यु और उद्गाता ये वाणी द्वारा दूसरे मार्गका संस्कार करते हैं। यदि प्रातरनुवाकके आरम्भ हो जानेपर परिधानीया ऋचाके उच्चारणसे पूर्व ब्रह्मा बोल उठता है तो वह केवल एक मार्गका ही संस्कार करता
१. क्योंकि मनसे चिन्तन करके वाणीसे उच्चारण करनेवाला पुरुष ही इनके पूर्वापरभावरूप क्रमपूर्वक यज्ञ-सम्पादन करता है।