भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 435

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३१


है, दूसरा मार्ग नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार एक पाँवसे चलनेवाला पुरुष अथवा एक पहियेसे चलनेवाला रथ नष्ट हो जाता है उसी प्रकार इसका यज्ञ भी नाशको प्राप्त हो जाता है। यज्ञके नष्ट होनेके पश्चात् यजमानका नाश होता है; इस प्रकारका यज्ञ करनेपर वह और भी अधिक पापी हो जाता है ॥ २-३ ॥

| तयोर्वर्त्तन्योरन्यतरां वर्त्तनीं मनसा विवेकज्ञानवता संस्करोति ब्रह्मर्त्विग्वाचा वर्त्तन्या होताध्वर्यु रुद्गातेत्येते त्रयोऽप्यृत्विजोऽन्यतरां वाग्लक्षणां वर्त्तनीं वाचैव संस्कुर्वन्ति । तत्रैवं सति वाङ्मनसे वर्त्तनी संस्कार्ये यज्ञे । | उन दोनों मागोंमेंसे किसी एक मार्गका ब्रह्मनामक ऋत्विक् विवेकज्ञानयुक्त चित्तद्वारा संस्कार करता है तथा होता, अध्वर्यु और उद्गाता ये तीनों ऋत्विक् भी दूसरे वाक्नामक मार्गका वाणीके द्वारा ही संस्कार करते हैं। अतः ऐसा होनेके कारण यज्ञमें वाक् और मन दोनों ही मागोंका संस्कार करना चाहिये। | | अथ स ब्रह्मा यत्र यस्मिन्काल उपाकृते प्रारब्धे प्रातरनुवाके शस्त्रे पुरा पूर्वं परिधानीयाया ऋचो ब्रह्मैतस्मिन्नन्तरे काले व्यववदति मौनं परित्यजति यदि तदान्यतरामेव वाग्वर्त्तनीं संस्करोति । ब्रह्मणासंस्क्रियमाणा मनोवर्त्तनी हीयते विनश्यति छिद्रीभवत्यन्यतरा, स यज्ञो वाग्वर्त्तन्यैवान्यतरया वर्तितुमशक्नुवन्निष्यति । | इसके बाद यह ब्रह्मा जिस कालमें प्रातरनुवाक शस्त्रका प्रारम्भ हो गया हो उस समयसे परिधानीया ऋचाके उच्चारणसे पूर्व बोल उठता है—यदि मौन छोड़ देता है तो एक अर्थात् वाक्रूप मार्गका ही संस्कार करता है। इस प्रकार ब्रह्माद्वारा संस्कारशून्य हुआ एक मनरूप मार्ग विनष्ट अर्थात् छिद्रयुक्त हो जाता है। तब वह यज्ञ एकमात्र वाग्वर्त्तनीसे ही रहनेमें असमर्थ होनेके कारण नष्ट हो जाता है। |