छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 436, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| कथमिव ? इत्याह—स यथैकपात्पुरुषो व्रजन्गच्छन्नध्वानं रिष्यति, रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो गच्छन्निरिष्यति, एवमस्य यजमानस्य कुब्रह्मणा यज्ञो रिष्यति विनश्यति । यज्ञं रिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति; यज्ञप्राणो हि यजमानः, अतो युक्तो यज्ञरेषे रेषस्तस्य । स तं यज्ञमिष्ट्वा तादृशं पापीयान्पापतरो भवति ॥ २-३ ॥ | किस प्रकार नष्ट हो जाता है ? यह श्रुति बतलाती है—जिस प्रकार मार्गमें एक पाँवसे चलनेवाला मनुष्य गिर जाता है अथवा एक पहियेसे चलनेवाला रथ नाशको प्राप्त होता है उसी प्रकार कुत्सित ब्रह्माके द्वारा इस यजमानका यज्ञ नष्ट हो जाता है। यज्ञके नष्ट होनेके पश्चात् यजमानका भी नाश होता है, क्योंकि यजमानका तो यज्ञ ही प्राण है, इसलिये यज्ञके नाश होनेपर उसका नाश होना उचित ही है। वह इस प्रकारके उस यज्ञका यजन करनेपर पापीयान्—अधिकतर पापी होता है ॥ २-३ ॥ |
ब्रह्माके मौनपालनसे यज्ञकी प्रतिष्ठा
अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदत्युभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा ॥ ४ ॥ स यथोभयपाद्व्रजन्नरथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान् भवति ॥ ५ ॥
और यदि प्रातरनुवाकका आरम्भ होनेके अनन्तर परिधानीया ऋचासे पूर्व ब्रह्मा नहीं बोलता है तो [ समस्त ऋत्विक् मिलकर ] दोनों ही मार्गोंका संस्कार कर देते हैं । तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं होता । जिस प्रकार दोनों पैरोंसे चलनेवाला पुरुष अथवा दोनों पहियोंसे चलने-