छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 437, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३३
वाला रथ स्थित रहता है इसी प्रकार इसका यज्ञ स्थित रहता है, यज्ञके स्थित रहनेपर यजमान भी स्थित रहता है। वह [ऐसा] यज्ञ करके श्रेष्ठ होता है ॥ ४-५ ॥
| अथ पुनर्यत्र ब्रह्मा विद्वान्मौनं परिगृह्य वाग्विसर्गमकुर्वन्वर्तते यावत्परिधानीयाया न व्यववदति तथैव सर्वर्त्विज उभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरापि। किमिव ? इत्याह पूर्वोक्तविपरीतौ दृष्टान्तौ। एवमस्य यजमानस्य यज्ञः स्ववर्तनीभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठति स्वेनात्मनाविनश्यन्वर्तत इत्यर्थः। यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति। स यजमान एवं मौनविज्ञानवद्ब्रह्मोपेतं यज्ञमिष्ट्वा श्रेयानम्भवति श्रेष्ठो भवतीत्यर्थः ॥४-५॥ | किन्तु जहाँ विद्वान् ब्रह्मा मौन ग्रहण करनेके अनन्तर परिधानीया ऋचापर्यन्त वाणी उच्चारण न करता हुआ रहता है, मौन त्याग नहीं करता; और उसीकी तरह अन्य सब ऋत्विक् भी [नियमबद्ध] रहते हैं, वहाँ वे सब दोनों ही मार्गोंका संस्कार कर देते हैं। तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं होता। किस प्रकार नष्ट नहीं होता, इसमें श्रुति पहलेसे विपरीत दृष्टान्त देती है। तात्पर्य यह है कि उसी प्रकार अपने दोनों मार्गोंद्वारा स्थित हुआ इस यजमानका यज्ञ प्रतिष्ठित होता है, अर्थात् अपने स्वरूपसे भ्रष्ट न होता हुआ वर्तमान रहता है। यज्ञके प्रतिष्ठित रहनेपर यजमान भी उसीकी तरह प्रतिष्ठित रहता है। इस प्रकारके मौन-विज्ञानयुक्त ब्रह्मावाला वह यजमान यज्ञ करके श्रेयान् होता है अर्थात् श्रेष्ठ होता है ॥ ४-५ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥