भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 978 में से

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पृष्ठ 438

सप्तदश खण्ड

यज्ञ-दोषके प्रायश्चित्तरूपसे व्याहृतियोंकी उपासना

अत्र ब्रह्मणो मौनं विहितम्; तद्रेषे ब्रह्मत्वकर्मणि चाथान्यस्मिंश्च हौत्रादिकर्मरेषे व्याहृतिहोमः प्रायश्चित्तमिति तदर्थं व्याहृतयो विधातव्या इत्याह-यहाँ ब्रह्माके मौनका विधान किया गया, उसका भ्रंश होनेपर ब्रह्मत्व कर्मका विनाश होने अथवा अन्य किसी हौत्रादि कर्मका विनाश होनेपर व्याहृतिहोम यह प्रायश्चित्त है; उसके लिये व्याहृतियोंका विधान करना है, इसलिये श्रुति कहती है-

प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेषां तप्यमानानाँ रसान् प्रावृहदग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षादादित्यं दिवः ॥ १॥

प्रजापतिने लोकोंको लक्ष्य बनाकर ध्यानरूप तप किया। उन तप किये जाते हुए लोकोंसे उसने रस निकाले। पृथिवीसे अग्नि, अन्तरिक्षसे वायु और द्युलोकसे आदित्यको उद्धृत किया ॥ १ ॥

प्रजापतिर्लोकानभ्यतपल्लोकानुद्दिश्य तत्र सारजिघृक्षया ध्यानलक्षणं तपश्चकार। तेषां तप्यमानानां लोकानां रसान्साररूपान्प्रावृहदुद्धृतवाञ्जग्राहेत्यर्थः।<br><br>कान् ? अग्निं रसं पृथिव्याः,प्रजापतिने लोकोंको अर्थात् लोकोंको लक्ष्य बनाकर उनसे सार ग्रहण करने की इच्छासे ध्यानरूप तप किया। इस प्रकार तप किये जाते हुए उन लोकोंके साररूप रसोंको 'प्रावृहत्' — उद्धृत अर्थात् ग्रहण किया। किन रसोंको ग्रहण किया ? पृथिवीसे अग्निरूप रस
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