छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 439, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थं ४३५
| वायुमन्तरिक्षात्, आदित्यं दिवः ॥ १ ॥ | अन्तरिक्षसे वायुरूप रस और द्युलोक-से आदित्यरूप रस ग्रहण किया ॥ १ ॥ |
स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत्तासां तप्यमानानाँ रसान्प्रावृहदग्नेर्ऋचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् ॥ २ ॥
[ फिर ] उसने इन तीन देवताओंको लक्ष्य करके तप किया । उन तप किये जाते हुए देवताओंसे उसने रस निकाले । अग्निसे ऋक्, वायुसे यजुः और आदित्यसे साम ग्रहण किये ॥ २ ॥
| पुनरप्येवमेवाग्न्याद्याः स एतास्तिस्रो देवता उद्दिश्याभ्यतपत् । ततोऽपि सारं रसं त्रयी-विद्यां जग्राह ॥ २ ॥ | फिर भी उसी प्रकार उसने अग्नि आदि तीन देवताओंको लक्ष्य बनाकर तप किया । उनसे भी त्रयी-विद्यारूप सार—रस ग्रहण किया ॥ २ ॥ |
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स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत्तस्यास्तप्यमानाया रसान्प्रावृहद्भूरित्यृग्भ्यो भुवरिति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ॥ ३ ॥ तद्यदृक्तो रिष्येद्भूः स्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयादृचामेव तद्रसेनर्चां वीर्येणर्चां यज्ञस्य विरिष्टँ संदधाति ॥ ४ ॥
[ तदनन्तर ] उसने इस त्रयीविद्याको लक्ष्य करके तप किया । उस तप की जाती हुई विद्यासे उसने रस निकाले । ऋक् श्रुतियोंसे भूः, यजुःश्रुतियोंसे भुवः तथा सामश्रुतियोंसे स्वः इन रसोंको ग्रहण किया । उस यज्ञमें यदि ऋक श्रुतियोंके सम्बन्धसे क्षत हो तो 'भूः स्वाहा' ॥ ऐसा कहकर गार्हपत्याग्निमें हवन करे । इस प्रकार वह ऋचाओंके रससे ऋचाओंके वीर्यद्वारा ऋक्सम्बन्धी यज्ञके क्षतको पूर्ति करता है ॥ ३-४ ॥