भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 978 में से

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पृष्ठ 440
४३६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| स एतां पुनरभ्यतपत्तत्रयीं विद्याम्। तस्यास्तप्यमानाया रसं भूरिति व्याहृतिमृग्भ्यो जग्राह, भुवरिति व्याहृतिं यजुर्भ्यः, स्वरिति व्याहृतिं सामभ्यः। अतएव लोकदेववेदरसा महाव्याहृतयः अतस्तत्तत्र यज्ञे यद्युक्त ऋक्संबन्धादृङ्निमित्तं रिष्येद्यज्ञः क्षतं प्राप्नुयाद्भूःस्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयात्, सा तत्र प्रायश्चित्तिः। कथम् ? ऋचामेव, तदिति क्रियाविशेषणम्, रसेनर्चां वीर्येणौजसर्च्चां यज्ञस्य ऋक्संवन्धिनो यज्ञस्य विरिष्टं विच्छिन्नं क्षतरूपमुत्पन्नं संदधाति प्रतिसंधत्ते ॥ ३-४ ॥ | फिर उसने इस त्रयीविद्याको लक्ष्य करके तप किया । उस तप की जाती हुई विद्याके रस 'भूः' इस व्याहृतिको ऋक्श्रुतियोंसे ग्रहण किया । तथा 'भुवः' इस व्याहृतिको यजुःश्रुतियोंसे और 'स्वः' इस व्याहृतिको सामश्रुतियोंसे ग्रहण किया । इसीसे ये महाव्याहृतियाँ लोक, देव और वेदकी सारभूत हैं। इसलिये यदि उस यज्ञमें ऋक्से—ऋक् के सम्बन्धसे—ऋक् के कारण क्षत प्राप्त हो तो 'भूः स्वाहा' ऐसा कहकर गार्हपत्याग्निमें हवन करे। उस अवस्था में वही प्रायश्चित्त है। किस प्रकार ? ऋचाओंके ही रससे ऋचाओंके वीर्य-ओजद्वारा वह यज्ञके ऋक्-सम्बन्धी विरिष्ट—विच्छेद अर्थात् उत्पन्न हुए क्षतकी पूर्ति करता है। 'ऋचामेव तत्' इसमें 'तत्' यह क्रियाविशेषण है ॥ ३-४ ॥ |


अथ यदि यजुष्टो रिष्येद्भुवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयाद्यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरिष्टꣳसंदधाति ॥ ५ ॥