छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
षोडश खण्ड
यज्ञोपासना
| रहस्यप्रकरणे प्रसङ्गादारण्यकत्वसामान्याच्च यज्ञे क्षत उत्पन्ने व्याहृतयः प्रायश्चित्तार्था विधातव्यास्तदभिज्ञस्य चर्त्विजो ब्रह्मणो मौनमित्यत इदमारभ्यते— | रहस्य (उपासना) के प्रकरणमें [मार्गोपदेशका] प्रसङ्ग होनेके कारण, [पूर्वोत्तर प्रकरणोंका] आरण्यकत्वमें सादृश्य होनेके कारण, और यज्ञमें कोई क्षत प्राप्त होनेपर उसके प्रायश्चित्तके लिये व्याहृतियोंका विधान करना है—तथा प्रायश्चित्तको जाननेवाले ऋत्विक् ब्रह्माके लिये मौनका विधान करना है—इसलिये यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है— |
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एष ह वै यज्ञो योऽयं पवत एष ह यन्निदꣳसर्वं पुनाति। यदेष यन्निदꣳसर्वं पुनाति तस्मादेष एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक्च वर्तनी ॥ १ ॥
यह जो चलता है निश्चय यज्ञ ही है। यह चलता हुआ निश्चय इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करता है; क्योंकि यह गमन करता हुआ इस समस्त संसारको पवित्र कर देता है इसलिये यही यज्ञ है। मन और वाक्—ये दोनों इसके मार्ग हैं ॥ १ ॥
| एष ह वा एष वायुर्योऽयं पवतेऽयं यज्ञः। ह वा इति प्रसिद्धार्थावद्योतकौ निपातौ। वायुप्रतिष्ठो हि यज्ञः प्रसिद्धः | ‘एष ह वै’—यह वायु जो कि चलता है, यज्ञ है। ‘ह’ और ‘वै’ ये प्रसिद्ध पदार्थके द्योतक निपात हैं। श्रुतियोंमें यह वायुरूप प्रतिष्ठावाला ही प्रसिद्ध है। जैसा कि |
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खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थं ४२९
| श्रुतिषु, "स्वाहा वाते धाः"¹ (यजु० २।२१ तथा ८।२१) "अयं वै यज्ञो योऽयं पवते" इत्यादिश्रुतिभ्यः । वात एव हि चलनात्मकत्वात्क्रियासमवायी । "वात एव यज्ञस्यारम्भको वातः प्रतिष्ठा" इति च श्रवणात् । | "यह यज्ञ आपके हाथमें सौंपता हूँ। आप इसे वायु देवतामें स्थापित करें।" "यह निश्चय यज्ञ ही है जो कि चलता है" इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है। चलनात्मक स्वरूप गुणवाला होनेके कारण वायुका ही क्रियासे समवाय-सम्बन्ध है; जैसा कि श्रुति कहती है—"वायु ही यज्ञका आरम्भक है और वायु ही उसकी प्रतिष्ठा है।" | | एष ह यन्गच्छंश्चलन्निदं सर्वं जगत्पुनाति पावयति शोधयति । न ह्यचलतः शुद्धिरस्ति । दोष-निरसनं चलतो हि दृष्टं न स्थिरस्य । यद्यस्माच्च यन्नेषदं सर्वं पुनाति यस्मादेष एव यज्ञो यत्पुनातीति । | यह चलता—गमन करता हुआ इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र—शुद्ध कर देता है। जो नहीं चलता [ अर्थात् विहित क्रियाका अनुष्ठान नहीं करता ] उसकी शुद्धि नहीं होती। दोषनिवृत्ति गतिशीलकी ही देखी जाती है, स्थिरकी नहीं देखी जाती; क्योंकि यह चलता हुआ इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र कर देता है इसलिये यही यज्ञ है, क्योंकि पवित्र करता है। | | तस्यास्यैवं विशिष्टस्य यज्ञस्य वाक्च मन्त्रोच्चारणे व्यापृता, मनश्च यथाभूतार्थज्ञाने व्यापृतम्, ते एते वाङ्मनसे वर्तनी मार्गों | उस इस प्रकारकी विशेषता-वाले यज्ञके मन्त्रोच्चारणमें प्रवृत्त वाणी और यथार्थ वस्तुके ज्ञानमें प्रवृत्त मन---ये दोनों अर्थात् वाणी और मन 'वर्तनी'--मार्ग हैं। जिन- |
१ इस मन्त्रकी एक अर्धाली इस प्रकार है- 'मनसस्पत इमं देव यज्ञँ स्वाहा वाते धाः' अर्थात् 'हे चित्तके प्रवर्तक देव (परमेश्वर)! मैं यह यज्ञ आपके हाथोंमें सौंपता हूँ, आप इसे वायु देवतामें स्थापित करें।'
४३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| ४३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| याभ्यां यज्ञस्तायमानः प्रवर्तते ते वर्तनी। "प्राणापानपरिचलनवत्या हि वाचश्चित्तस्य चोत्तरोत्तरक्रमो यद्यज्ञः" इति हि श्रुत्यन्तरम् । अतो वाङ्मनसाभ्यां यज्ञो वर्तते इति वाङ्मनसे वर्तनी उच्येते यज्ञस्य ॥ १ ॥ | के द्वारा विस्तृत किया हुआ यज्ञ प्रवृत्त होता है उन्हें 'वर्तनी' कहते हैं। "प्राण और अपान इन दोनोंके योगसे जिनका परिचलन होता है। उन वाणी और मनका जो पूर्वापरक्रम¹ है वही यज्ञ है"—ऐसी एक दूसरी श्रुति कहती है। इस प्रकार क्योंकि वाणी और मनसे यज्ञ प्रवृत्त होता है, इसलिये वाणी और मन यज्ञके मार्ग कहे गये हैं ॥ १ ॥ |
ब्रह्माके मौनभङ्गसे यज्ञकी हानि
तयोरन्यतरां मनसा संस्करोति ब्रह्मा वाचा होताध्वर्यु रुद्गातान्यतराꣳस यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदति ॥ २ ॥ अन्यतरामेव वर्तनीꣳसंस्करोति हीयतेऽन्यतरा स यथैकपादद्व्रजन्रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यत्येवमस्य यज्ञो रिष्यति यज्ञꣳरिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति स इष्ट्वा पापीयान् भवति ॥ ३ ॥
उनमेंसे एक मार्गका ब्रह्मा मनके द्वारा संस्कार करता है तथा होता, अध्वर्यु और उद्गाता ये वाणी द्वारा दूसरे मार्गका संस्कार करते हैं। यदि प्रातरनुवाकके आरम्भ हो जानेपर परिधानीया ऋचाके उच्चारणसे पूर्व ब्रह्मा बोल उठता है तो वह केवल एक मार्गका ही संस्कार करता
१. क्योंकि मनसे चिन्तन करके वाणीसे उच्चारण करनेवाला पुरुष ही इनके पूर्वापरभावरूप क्रमपूर्वक यज्ञ-सम्पादन करता है।
खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३१
है, दूसरा मार्ग नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार एक पाँवसे चलनेवाला पुरुष अथवा एक पहियेसे चलनेवाला रथ नष्ट हो जाता है उसी प्रकार इसका यज्ञ भी नाशको प्राप्त हो जाता है। यज्ञके नष्ट होनेके पश्चात् यजमानका नाश होता है; इस प्रकारका यज्ञ करनेपर वह और भी अधिक पापी हो जाता है ॥ २-३ ॥
| तयोर्वर्त्तन्योरन्यतरां वर्त्तनीं मनसा विवेकज्ञानवता संस्करोति ब्रह्मर्त्विग्वाचा वर्त्तन्या होताध्वर्यु रुद्गातेत्येते त्रयोऽप्यृत्विजोऽन्यतरां वाग्लक्षणां वर्त्तनीं वाचैव संस्कुर्वन्ति । तत्रैवं सति वाङ्मनसे वर्त्तनी संस्कार्ये यज्ञे । | उन दोनों मागोंमेंसे किसी एक मार्गका ब्रह्मनामक ऋत्विक् विवेकज्ञानयुक्त चित्तद्वारा संस्कार करता है तथा होता, अध्वर्यु और उद्गाता ये तीनों ऋत्विक् भी दूसरे वाक्नामक मार्गका वाणीके द्वारा ही संस्कार करते हैं। अतः ऐसा होनेके कारण यज्ञमें वाक् और मन दोनों ही मागोंका संस्कार करना चाहिये। | | अथ स ब्रह्मा यत्र यस्मिन्काल उपाकृते प्रारब्धे प्रातरनुवाके शस्त्रे पुरा पूर्वं परिधानीयाया ऋचो ब्रह्मैतस्मिन्नन्तरे काले व्यववदति मौनं परित्यजति यदि तदान्यतरामेव वाग्वर्त्तनीं संस्करोति । ब्रह्मणासंस्क्रियमाणा मनोवर्त्तनी हीयते विनश्यति छिद्रीभवत्यन्यतरा, स यज्ञो वाग्वर्त्तन्यैवान्यतरया वर्तितुमशक्नुवन्निष्यति । | इसके बाद यह ब्रह्मा जिस कालमें प्रातरनुवाक शस्त्रका प्रारम्भ हो गया हो उस समयसे परिधानीया ऋचाके उच्चारणसे पूर्व बोल उठता है—यदि मौन छोड़ देता है तो एक अर्थात् वाक्रूप मार्गका ही संस्कार करता है। इस प्रकार ब्रह्माद्वारा संस्कारशून्य हुआ एक मनरूप मार्ग विनष्ट अर्थात् छिद्रयुक्त हो जाता है। तब वह यज्ञ एकमात्र वाग्वर्त्तनीसे ही रहनेमें असमर्थ होनेके कारण नष्ट हो जाता है। |
४३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| ४३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| कथमिव ? इत्याह—स यथैकपात्पुरुषो व्रजन्गच्छन्नध्वानं रिष्यति, रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो गच्छन्निरिष्यति, एवमस्य यजमानस्य कुब्रह्मणा यज्ञो रिष्यति विनश्यति । यज्ञं रिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति; यज्ञप्राणो हि यजमानः, अतो युक्तो यज्ञरेषे रेषस्तस्य । स तं यज्ञमिष्ट्वा तादृशं पापीयान्पापतरो भवति ॥ २-३ ॥ | किस प्रकार नष्ट हो जाता है ? यह श्रुति बतलाती है—जिस प्रकार मार्गमें एक पाँवसे चलनेवाला मनुष्य गिर जाता है अथवा एक पहियेसे चलनेवाला रथ नाशको प्राप्त होता है उसी प्रकार कुत्सित ब्रह्माके द्वारा इस यजमानका यज्ञ नष्ट हो जाता है। यज्ञके नष्ट होनेके पश्चात् यजमानका भी नाश होता है, क्योंकि यजमानका तो यज्ञ ही प्राण है, इसलिये यज्ञके नाश होनेपर उसका नाश होना उचित ही है। वह इस प्रकारके उस यज्ञका यजन करनेपर पापीयान्—अधिकतर पापी होता है ॥ २-३ ॥ |
ब्रह्माके मौनपालनसे यज्ञकी प्रतिष्ठा
अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदत्युभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा ॥ ४ ॥ स यथोभयपाद्व्रजन्नरथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान् भवति ॥ ५ ॥
और यदि प्रातरनुवाकका आरम्भ होनेके अनन्तर परिधानीया ऋचासे पूर्व ब्रह्मा नहीं बोलता है तो [ समस्त ऋत्विक् मिलकर ] दोनों ही मार्गोंका संस्कार कर देते हैं । तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं होता । जिस प्रकार दोनों पैरोंसे चलनेवाला पुरुष अथवा दोनों पहियोंसे चलने-
खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३३
वाला रथ स्थित रहता है इसी प्रकार इसका यज्ञ स्थित रहता है, यज्ञके स्थित रहनेपर यजमान भी स्थित रहता है। वह [ऐसा] यज्ञ करके श्रेष्ठ होता है ॥ ४-५ ॥
| अथ पुनर्यत्र ब्रह्मा विद्वान्मौनं परिगृह्य वाग्विसर्गमकुर्वन्वर्तते यावत्परिधानीयाया न व्यववदति तथैव सर्वर्त्विज उभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरापि। किमिव ? इत्याह पूर्वोक्तविपरीतौ दृष्टान्तौ। एवमस्य यजमानस्य यज्ञः स्ववर्तनीभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठति स्वेनात्मनाविनश्यन्वर्तत इत्यर्थः। यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति। स यजमान एवं मौनविज्ञानवद्ब्रह्मोपेतं यज्ञमिष्ट्वा श्रेयानम्भवति श्रेष्ठो भवतीत्यर्थः ॥४-५॥ | किन्तु जहाँ विद्वान् ब्रह्मा मौन ग्रहण करनेके अनन्तर परिधानीया ऋचापर्यन्त वाणी उच्चारण न करता हुआ रहता है, मौन त्याग नहीं करता; और उसीकी तरह अन्य सब ऋत्विक् भी [नियमबद्ध] रहते हैं, वहाँ वे सब दोनों ही मार्गोंका संस्कार कर देते हैं। तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं होता। किस प्रकार नष्ट नहीं होता, इसमें श्रुति पहलेसे विपरीत दृष्टान्त देती है। तात्पर्य यह है कि उसी प्रकार अपने दोनों मार्गोंद्वारा स्थित हुआ इस यजमानका यज्ञ प्रतिष्ठित होता है, अर्थात् अपने स्वरूपसे भ्रष्ट न होता हुआ वर्तमान रहता है। यज्ञके प्रतिष्ठित रहनेपर यजमान भी उसीकी तरह प्रतिष्ठित रहता है। इस प्रकारके मौन-विज्ञानयुक्त ब्रह्मावाला वह यजमान यज्ञ करके श्रेयान् होता है अर्थात् श्रेष्ठ होता है ॥ ४-५ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥
सप्तदश खण्ड
यज्ञ-दोषके प्रायश्चित्तरूपसे व्याहृतियोंकी उपासना
| अत्र ब्रह्मणो मौनं विहितम्; तद्रेषे ब्रह्मत्वकर्मणि चाथान्यस्मिंश्च हौत्रादिकर्मरेषे व्याहृतिहोमः प्रायश्चित्तमिति तदर्थं व्याहृतयो विधातव्या इत्याह- | यहाँ ब्रह्माके मौनका विधान किया गया, उसका भ्रंश होनेपर ब्रह्मत्व कर्मका विनाश होने अथवा अन्य किसी हौत्रादि कर्मका विनाश होनेपर व्याहृतिहोम यह प्रायश्चित्त है; उसके लिये व्याहृतियोंका विधान करना है, इसलिये श्रुति कहती है- |
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प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेषां तप्यमानानाँ रसान् प्रावृहदग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षादादित्यं दिवः ॥ १॥
प्रजापतिने लोकोंको लक्ष्य बनाकर ध्यानरूप तप किया। उन तप किये जाते हुए लोकोंसे उसने रस निकाले। पृथिवीसे अग्नि, अन्तरिक्षसे वायु और द्युलोकसे आदित्यको उद्धृत किया ॥ १ ॥
| प्रजापतिर्लोकानभ्यतपल्लोकानुद्दिश्य तत्र सारजिघृक्षया ध्यानलक्षणं तपश्चकार। तेषां तप्यमानानां लोकानां रसान्साररूपान्प्रावृहदुद्धृतवाञ्जग्राहेत्यर्थः।<br><br>कान् ? अग्निं रसं पृथिव्याः, | प्रजापतिने लोकोंको अर्थात् लोकोंको लक्ष्य बनाकर उनसे सार ग्रहण करने की इच्छासे ध्यानरूप तप किया। इस प्रकार तप किये जाते हुए उन लोकोंके साररूप रसोंको 'प्रावृहत्' — उद्धृत अर्थात् ग्रहण किया। किन रसोंको ग्रहण किया ? पृथिवीसे अग्निरूप रस |
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खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थं ४३५
| वायुमन्तरिक्षात्, आदित्यं दिवः ॥ १ ॥ | अन्तरिक्षसे वायुरूप रस और द्युलोक-से आदित्यरूप रस ग्रहण किया ॥ १ ॥ |
स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत्तासां तप्यमानानाँ रसान्प्रावृहदग्नेर्ऋचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् ॥ २ ॥
[ फिर ] उसने इन तीन देवताओंको लक्ष्य करके तप किया । उन तप किये जाते हुए देवताओंसे उसने रस निकाले । अग्निसे ऋक्, वायुसे यजुः और आदित्यसे साम ग्रहण किये ॥ २ ॥
| पुनरप्येवमेवाग्न्याद्याः स एतास्तिस्रो देवता उद्दिश्याभ्यतपत् । ततोऽपि सारं रसं त्रयी-विद्यां जग्राह ॥ २ ॥ | फिर भी उसी प्रकार उसने अग्नि आदि तीन देवताओंको लक्ष्य बनाकर तप किया । उनसे भी त्रयी-विद्यारूप सार—रस ग्रहण किया ॥ २ ॥ |
— : ० : —
स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत्तस्यास्तप्यमानाया रसान्प्रावृहद्भूरित्यृग्भ्यो भुवरिति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ॥ ३ ॥ तद्यदृक्तो रिष्येद्भूः स्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयादृचामेव तद्रसेनर्चां वीर्येणर्चां यज्ञस्य विरिष्टँ संदधाति ॥ ४ ॥
[ तदनन्तर ] उसने इस त्रयीविद्याको लक्ष्य करके तप किया । उस तप की जाती हुई विद्यासे उसने रस निकाले । ऋक् श्रुतियोंसे भूः, यजुःश्रुतियोंसे भुवः तथा सामश्रुतियोंसे स्वः इन रसोंको ग्रहण किया । उस यज्ञमें यदि ऋक श्रुतियोंके सम्बन्धसे क्षत हो तो 'भूः स्वाहा' ॥ ऐसा कहकर गार्हपत्याग्निमें हवन करे । इस प्रकार वह ऋचाओंके रससे ऋचाओंके वीर्यद्वारा ऋक्सम्बन्धी यज्ञके क्षतको पूर्ति करता है ॥ ३-४ ॥
४३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| ४३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| स एतां पुनरभ्यतपत्तत्रयीं विद्याम्। तस्यास्तप्यमानाया रसं भूरिति व्याहृतिमृग्भ्यो जग्राह, भुवरिति व्याहृतिं यजुर्भ्यः, स्वरिति व्याहृतिं सामभ्यः। अतएव लोकदेववेदरसा महाव्याहृतयः अतस्तत्तत्र यज्ञे यद्युक्त ऋक्संबन्धादृङ्निमित्तं रिष्येद्यज्ञः क्षतं प्राप्नुयाद्भूःस्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयात्, सा तत्र प्रायश्चित्तिः। कथम् ? ऋचामेव, तदिति क्रियाविशेषणम्, रसेनर्चां वीर्येणौजसर्च्चां यज्ञस्य ऋक्संवन्धिनो यज्ञस्य विरिष्टं विच्छिन्नं क्षतरूपमुत्पन्नं संदधाति प्रतिसंधत्ते ॥ ३-४ ॥ | फिर उसने इस त्रयीविद्याको लक्ष्य करके तप किया । उस तप की जाती हुई विद्याके रस 'भूः' इस व्याहृतिको ऋक्श्रुतियोंसे ग्रहण किया । तथा 'भुवः' इस व्याहृतिको यजुःश्रुतियोंसे और 'स्वः' इस व्याहृतिको सामश्रुतियोंसे ग्रहण किया । इसीसे ये महाव्याहृतियाँ लोक, देव और वेदकी सारभूत हैं। इसलिये यदि उस यज्ञमें ऋक्से—ऋक् के सम्बन्धसे—ऋक् के कारण क्षत प्राप्त हो तो 'भूः स्वाहा' ऐसा कहकर गार्हपत्याग्निमें हवन करे। उस अवस्था में वही प्रायश्चित्त है। किस प्रकार ? ऋचाओंके ही रससे ऋचाओंके वीर्य-ओजद्वारा वह यज्ञके ऋक्-सम्बन्धी विरिष्ट—विच्छेद अर्थात् उत्पन्न हुए क्षतकी पूर्ति करता है। 'ऋचामेव तत्' इसमें 'तत्' यह क्रियाविशेषण है ॥ ३-४ ॥ |
अथ यदि यजुष्टो रिष्येद्भुवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयाद्यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरिष्टꣳसंदधाति ॥ ५ ॥
खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३७
और यदि यजुःश्रुतियोंके कारण क्षत हो तो 'भुवः स्वाहा' ऐसा कहकर दक्षिणाग्निमें हवन करे। इस प्रकार वह यजुओंके रससे यजुओंके वीर्यद्वारा यज्ञके यजुःसम्बन्धी क्षतकी पूर्ति करता है ॥ ५ ॥
अथ यदि सामतो रिष्येत्स्वः स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात्साम्नामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य विरिष्टंसंदधाति ॥ ६ ॥
और यदि सामश्रुतियोंके कारण क्षत हो तो 'स्वः स्वाहा' ऐसा कहकर आहवनीयाग्निमें हवन करे। इस प्रकार वह सामके रससे सामके वीर्य द्वारा यज्ञके सामसम्बन्धी क्षतकी पूर्ति करता है ॥ ६ ॥
| भाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अथ यदि यजुष्टो यजुर्निमित्तं रिष्येद्भूवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयात्। तथा सामनिमित्ते रेषे स्वः स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात् । तथा पूर्ववद्यज्ञं संदधाति । ब्रह्मनिमित्ते तु रेषे त्रिष्वग्निषु तिसृभिर्व्याहृतिभिर्जुहुयात् । त्रय्या हि विद्यायाः स रेषः । "अथ केन | और यदि यजुर्निमित्तक क्षत हो तो 'भुवः स्वाहा' ऐसा कहकर दक्षिणाग्निमें हवन करे, तथा सामसम्बन्धी क्षत होनेपर 'स्वः स्वाहा' ऐसा कहकर आहवनीयाग्निमें हवन करे। इस प्रकार वह पूर्ववत् ( ऋक्सम्बन्धी क्षतमें किये हुएके अनुसार ) यज्ञक्षतकी पूर्ति कर लेता है। [ ये सब प्रायश्चित्त होता, उद्गाता और अध्वर्युद्वारा होनेवाले क्षतोंकी पूर्तिके लिये हैं । ] ब्रह्माके कारण यज्ञक्षत होनेपर तो तीनों अग्नियोंमें तीनों व्याहृतियोंद्वारा हवन करे; क्योंकि [उसके द्वारा होनेवाला] वह यज्ञक्षत तो त्रयीविद्याका ही क्षत |
४३८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
४३८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
| ब्रह्मत्वमित्यनयैव त्रय्या विद्य- | है। जैसा कि "ब्रह्मत्व किसके द्वारा | | या" इति श्रुतेः। न्यायान्तरं वा | सिद्ध होता है? इस त्रयीविद्यासे | | | ही" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। | | | अथवा ब्रह्मत्वके कारण होनेवाले | | | यज्ञक्षतके लिये कोई और न्याय | | मृग्यं ब्रह्मत्वनिमित्ते रेषे ॥५-६॥ | ढूँढना चाहिये ॥ ५-६ ॥ |
—:००:—
विद्वान् ब्रह्माकी विशिष्टता
तद्यथा लवणेन सुवर्णꣳसंदध्यात्सुवर्णेन रजतꣳ रजतेन त्रपु त्रपुणा सीसꣳसीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा ॥७॥ एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्टꣳसंदधाति भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवति॥८॥
इस विषयमें [ऐसा समझना चाहिये कि] जिस प्रकार लवण (क्षार) से सुवर्णको, सुवर्णसे चाँदीको, चाँदीसे त्रपुको, त्रपुसे सीसेको, सीसेसे लोहेको, और लोहेसे काष्ठको अथवा चमड़ेसे काष्ठको जोड़ा जाता है। उसी प्रकार इन लोक, देवता और त्रयीविद्याके वीर्यसे यज्ञके क्षतका प्रतिसंधान किया जाता है। जिसमें इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ निश्चय ही मानो ओषधियोंद्वारा संस्कृत होता है ॥७-८॥
| तद्यथा लवणेन सुवर्णं संद- | उस सम्बन्धमें [ऐसा समझना | | ध्यात् क्षारेण टङ्कणादिना। | चाहिये कि] जिस प्रकार लवण- | | | टङ्कणादि क्षारसे सुवर्णको जोड़ा | | खरे मृदुत्वकरं हि तत्। सुवर्णेन | जाता है, क्योंकि वह कठिन | | | सुवर्णको मृदु करनेवाला है, सुवर्ण- | | रजतमशक्यसंधानं संदध्यात्। | से चाँदीको—जिसका जुड़ना | | | अत्यन्त कठिन है—जोड़ते हैं, | | रजतेन तथा त्रपु, त्रपुणा सीसं | इसी प्रकार चाँदीसे त्रपु (राँगा), |
खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थे ४३९
| सीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा चर्मबन्धनेन । एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण रसाख्येनौजसा यज्ञस्य विरिष्टं संदधाति । भेषजकृतो ह वा एष यज्ञः, रोगार्त इव पुमांश्चिकित्सकेन सुशिक्षितेनैष यज्ञो भवति । कोऽसौ ? यज्ञ यस्मिन्यज्ञ एवविद्यथोक्तव्याहृतिहोमप्रायश्चित्तविद्ब्रह्मात्विग्भवति स यज्ञ इत्यर्थः ॥ ७-८ ॥ | त्रपुसे सीसा, सीसेसे लोहा और लोहेसे काष्ठ अथवा चर्म—चमड़ेके बन्धनसे काष्ठको जोड़ा जाता है, उसी प्रकार इन लोक, देवता और त्रयीविद्याके वीर्य—रससंज्ञक ओजसे यज्ञक्षतकी पूर्ति करते हैं । सुशिक्षित चिकित्सकके द्वारा [नीरोग किये हुए] रोगार्त पुरुषके समान यह यज्ञ निश्चय ही मानो ओषधियोंद्वारा सुसंस्कृत होता है— कौन यज्ञ ? जहाँ अर्थात् जिस यज्ञमें इस प्रकार जाननेवाला यानी पूर्वोक्त व्याहृतिहोमरूप प्रायश्चित्त जाननेवाला ब्रह्मा ऋत्विक् होता है वह यज्ञ—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ७-८ ॥ |
—: o :—
| किं च— | तथा— |
एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवत्येवंविदग्ँह वा एषा ब्रह्माणमनुगाथा यतो यत आवर्तते तत्तद्गच्छति ॥ ९ ॥
जहाँ इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्प्रवण होता है । इस प्रकार जाननेवाले ब्रह्माके उद्देश्यसे ही यह गाथा प्रसिद्ध है कि "जहाँ-जहाँ कर्म आवृत्त होता है वहीं वह पहुँच जाता है" ॥९॥
| एष ह वा उदक्प्रवण उदङ्निम्नो दक्षिणोच्छ्रायो यज्ञो | जहाँ इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्प्रवण- उत्तरकी ओर झुका हुआ और |
४४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| ४४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भवति, उत्तरमार्गप्रतिपत्तिहेतुरि-<br>त्यर्थः, यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवति । एवं-<br>विदं ह वै ब्रह्माणमृत्विजं प्रत्ये-<br>षानुगाथा ब्रह्मणः स्तुतिपरा—<br>यतो यत आवर्तते कर्म प्रदेषादृ-<br>त्विजां यज्ञः क्षतीभवंस्तत्तद्यज्ञस्य<br>क्षतरूपं प्रतिसंदधत्प्रायश्चित्तेन<br>गच्छति परिपालयतीत्येतत् ॥९॥ | दक्षिण ओर उठा हुआ—अर्थात्<br>उत्तरमार्गकी प्राप्तिका हेतु होता है।<br>इस प्रकार जाननेवाले ब्रह्मा<br>ऋत्विक्के विषयमें ही ब्रह्माकी<br>स्तुति करनेवाली यह अनुगाथा है-<br>जिस-जिस प्रदेशसे कर्म आवृत्त होता<br>है अर्थात् होता आदि ऋत्विजोंका<br>यज्ञ क्षतयुक्त होता है उस-उस<br>यज्ञके क्षतकी प्रायश्चित्तसे पूर्ति करता<br>हुआ ब्रह्मा जाता है अर्थात् यज्ञकर्त्ता-<br>की सब प्रकार रक्षा करता है ॥ ९ ॥ |
मानवो ब्रह्मैवैक ऋत्विक्कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानँसर्वाँश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविद्मेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥१०॥
एक मानव ब्रह्मा ही ऋत्विक् है। जिस प्रकार युद्धमें घोड़ी योद्धाओंकी रक्षा करती है उसी प्रकार ऐसा जाननेवाला ब्रह्मा यज्ञ, यजमान और अन्य समस्त ऋत्विजोंकी भी सब ओरसे रक्षा करता है। अतः इस प्रकार जाननेवालेको ही ब्रह्मा बनावे, ऐसा न जाननेवालेको नहीं, ऐसा न जाननेवालेको नहीं ॥ १० ॥
| मान वो ब्रह्मा मौनाचरणान्म-<br>ननाद्वा ज्ञानवत्त्वात्ततो ब्रह्मैवैक-<br>र्त्विक्कु रून्र्कतॄ न् योद्धनारूढानश्वा | मौनाचरण करनेसे अथवा मनन<br>करनेके कारण ब्रह्मा मानव है;<br>अतः ज्ञानवान् होनेके कारण<br>ब्रह्मा ही एक ऋत्विक् है। जिस<br>प्रकार युद्धमें घोड़ी ‘कुरून्’-- |
खण्ड १७] शाङ्करभाष्यार्थ ४५१
| वडवा यथाभिरक्षत्येवंविद् ह वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तत्कृतदोषायनयनात् । यत एवं विशिष्टो ब्रह्मा विद्वान्, तस्मादेवंविदम् एव यथोक्तव्याहृत्यादिविदं ब्रह्माणं कुर्वीत, नानेवंविदं कदाचनेति । द्विरभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्त्यर्थः ॥ १० ॥ | कर्ताओंकी यानी अपनी पीठपर चढ़े हुए योद्धाओंकी सब प्रकारसे रक्षा करती है उसी प्रकार ऐसा जाननेवाला ब्रह्मा भी यज्ञ, यजमान और समस्त ऋत्विजोंकी, उनके किये हुए दोषोंकी निवृत्ति करके, सब ओरसे रक्षा करता है। क्योंकि विद्वान् ब्रह्मा ऐसा विशिष्टगुणसम्पन्न होता है इसलिये इस प्रकार—उपर्युक्त व्याहृति आदिका ज्ञान रखनेवालेको ही ब्रह्मा बनावे; इस प्रकार न जाननेवालेको कभी न बनावे। 'नानेवंविदं नानेवंविदम्' यह द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्तिके लिये है ॥ १० ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्विवरणे चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ॥ ४ ॥
</div>पञ्चम अध्याय
पञ्चम अध्याय
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प्रथम खण्ड
| उपक्रमः | |
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| सगुणब्रह्मविद्याया उत्तरा गतिरुक्ता। अथेदानीं पञ्चमेऽध्याये पञ्चाग्निविदो गृहस्थस्योर्ध्वरेतसां च श्रद्धालूनां विद्यान्तरशीलिनां तामेव गतिमनूद्यान्या दक्षिणदिक्संबन्धिनी केवलकर्मिणां धूमादिलक्षणा पुनरावृत्तिरूपा, तृतीया च ततः कष्टतरा संसारगतिः, वैराग्यहेतोर्वक्तव्या इत्यारभ्यते। प्राणः श्रेष्ठो वागादिभ्यः प्राणो वाव संवर्ग इत्यादि च बहुशोऽतीते ग्रन्थे प्राणग्रहणं कृतम्, स कथं श्रेष्ठो वागादिषु सर्वैः संहत्यकारित्वाविशेषे, कथं | [ गत अध्यायमें ] सगुण ब्रह्मविद्याकी उत्तर ( उत्तरायण मार्गरूपा ) गति कह दी गयी। अब इसके अनन्तर पञ्चम अध्यायमें पञ्चाग्निवेत्ता गृहस्थ तथा अन्य विद्याओंमें निष्ठा रखनेवाले श्रद्धालु ऊर्ध्वरेताओंकी उसी गतिका अनुवाद कर केवल कर्मपरायण पुरुषोंकी उससे भिन्न दक्षिण दिशासे सम्बन्ध रखनेवाली धूमादिलक्षणा पुनरावृत्तिरूपा गति और तीसरी उससे भी क्लिष्टतर संसारगतिका वैराग्यके लिये वर्णन करना है—इसीसे आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। वागादिकी अपेक्षा प्राण श्रेष्ठ है; क्योंकि गत ग्रन्थमें ‘प्राण ही संवर्ग है’ इत्यादि अनेकों प्रकारसे प्राणका ग्रहण किया गया है। ‘सबके साथ मिलकर कार्य करनेमें समानता होनेपर भी वह वागादि इन्द्रियोंमें श्रेष्ठ क्यों है ? और क्यों उसकी उपासना करनी चाहिये ?’— |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४३
| च तस्योपासनमिति तस्य श्रेष्ठत्वादिगुणविधित्सयेदमनन्तरमारभ्यते— | । इस शङ्काकी निवृत्तिके लिये उसके श्रेष्ठत्व आदि गुणोंका विधान करनेकी इच्छासे यह आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है— |
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ज्येष्ठश्रेष्ठादिगुणोपासना
यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥
जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है। निश्चय ही प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है ॥ १ ॥
| यो ह वै कश्चिज्ज्येष्ठं च प्रथमं वयसा श्रेष्ठं च गुणैरभ्यधिकं वेद, स ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति । फलेन पुरुषं प्रलोभ्याभिमुखीकृत्याह — प्राणो वाव ज्येष्ठश्च वयसा वागादिभ्यः । गर्भस्थे हि पुरुषे प्राणस्य वृत्तिर्वागादिभ्यः पूर्वं लब्धात्मिका भवति, यया गर्भो विवर्धते । चक्षुरादिस्थानावयवनिष्पत्तौ सत्यां पश्चाद्वागादीनां वृत्तिलाभ इति प्राणो ज्येष्ठो वयसा भवति । श्रेष्ठत्वं तु प्रति- | जो कोई ज्येष्ठ—आयुमें प्रथम और श्रेष्ठ—गुणोंमें अधिकको जानता है वह निश्चय ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है। इस प्रकार फलके द्वारा पुरुषको प्रलोभित कर उसे प्राणोपासनाके अभिमुख कर श्रुति कहती है—वागादिकी अपेक्षा प्राण ही आयुमें ज्येष्ठ है, क्योंकि पुरुषके गर्भस्थ होनेपर वागादिकी अपेक्षा प्राणकी वृत्ति पहले लब्ध-स्वरूप होती है, जिससे कि गर्भ बढ़ता है । वागादिकी वृत्तियोंका लाभ तो चक्षुरादि गोलक और अवयवोंके निष्पन्न हो जानेके अनन्तर होता है; इसलिये आयुकी दृष्टिसे प्राण ज्येष्ठ है । तथा उसकी |
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४४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| पादयिष्यति सुहय इत्यादिभि- | श्रेष्ठताका तो 'सुहयः' इत्यादि | | दर्शनेन । अतः प्राण एव | दृष्टान्तद्वारा [ बारहवें मन्त्रमें ] | | ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्चास्मिन्कार्यकरण- | प्रतिपादन किया जायगा । अतः | | संघाते ॥ १ ॥ | इस कार्यकारणसंघातमें प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है ॥ १ ॥ |
<div align="center">-: ० :-</div>यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥
जो कोई वसिष्ठको जानता है वह स्वजातियोंमें वसिष्ठ होता है; निश्चय ही वाक् वसिष्ठ है ॥ २ ॥
| यो ह वै वसिष्ठं वसितृ तम- | जो कोई वसिष्ठ—अत्यन्त | | माच्छादयितृतमं वसुत्तमं वा | बसनेवाले अर्थात् आच्छादन करने- | | यो वेद स तथैव वसिष्ठो ह | वालेको अथवा अत्यन्त वसुमान् | | भवति स्वानां ज्ञातीनाम् । | (धनवान्) को जानता है वह | | कस्तर्हि वसिष्ठः ? इत्याह— | उसी प्रकार अपने सजातियोंमें | | वाग्वाव वसिष्ठः, वाग्मिनो हि | वसिष्ठ होता है। अच्छा तो वसिष्ठ | | पुरुषा वसन्त्यभिभवन्त्यन्यान्य- | कौन है ? इसपर श्रुति कहती है— | | सुमत्त्तमाश्च, अतो वाग्वसिष्ठः | निश्चय ही वाक् वसिष्ठ है; क्योंकि | | ॥ २ ॥ | वाग्मी (श्रेष्ठ वक्ता) लोग ही बसते | | | अर्थात् दूसरोंका पराभव करते हैं; | | | और अधिक धनवान् भी होते हैं; | | | अतः वाक् ही वसिष्ठ है ॥ २ ॥ |
<div align="center">-: ० :-</div>यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिँश्च लोकेऽमुष्मिँश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥
जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है वह इस लोक और परलोकमें प्रतिष्ठित होता है; चक्षु ही प्रतिष्ठा है ॥ ३ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४५
| यो ह वै प्रतिष्ठां वेद स अस्मिँल्लोकेऽमुष्मिंश्च परे प्रतितिष्ठति ह । का तर्हि प्रतिष्ठा ? इत्याह—चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा । चक्षुषा हि पश्यन्समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति यस्मात्, अतः प्रतिष्ठा चक्षुः ॥ ३ ॥ | जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है वह इस लोक और परलोकमें प्रतिष्ठित होता है । अच्छा तो प्रतिष्ठा क्या है ? इसपर श्रुति कहती है—चक्षु ही प्रतिष्ठा है, क्योंकि चक्षुसे देखकर ही पुरुष सम और विषम प्रदेशमें स्थित होता है; इसलिये चक्षु ही प्रतिष्ठा है ॥३॥ |
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यो ह वै संपदं वेद सँहास्मै कामाः पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव संपत् ॥ ४ ॥
जो कोई सम्पद्को जानता है उसे दैव और मानुष काम ( भोग ) सम्यक् प्रकारसे प्राप्त होते हैं । श्रोत ही सम्पद् है ॥ ४ ॥
| यो ह वै संपदं वेद तस्मा अस्मै दैवाश्च मानुषाश्च कामाः संपद्यन्ते ह । का तर्हि संपद् ? इत्याह—श्रोत्रं वाव संपत् । यस्माच्छ्रोत्रेण वेदा गृह्यन्ते तदर्थविज्ञानं च, ततः कर्माणि क्रियन्ते, ततः कामसंपत् । इत्येवं कामसंपद्धेतुत्वाच्छ्रोत्रं वा संपत् ॥ ४ ॥ | जो कोई सम्पद्को जानता है उसे दैव और मानुष भोग सम्यक् प्रकारसे प्राप्त होते हैं । अच्छा तो सम्पद् क्या है ? इसपर श्रुति कहती है—श्रोत्र ही सम्पद् है, क्योंकि श्रोत्रसे वेद और उनके अथका विशेष ज्ञान ग्रहण किये जाते हैं, फिर कर्म किये जाते हैं और तदनन्तर भोगोंकी प्राप्ति होती है । इस प्रकार भोगोंकी प्राप्तिके हेतु होनेके कारण श्रोत्र ही सम्पद् हैं ॥ ४ ॥ |
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यो ह वा आयतनं वेदायतनँह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥
४४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
४४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
जो आयतनको जानता है वह स्वजातियोंका आयतन (आश्रय) होता है। निश्चय ही मन आयतन है ॥ ५ ॥
| यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवत्याश्रयो भवतीत्यर्थः। किं तदायतनम्? इत्याह मनो ह वा आयतनम्। इन्द्रियोपहृतानां विषयाणां भोक्त्रर्थानां प्रत्ययरूपाणां मन आयतनमाश्रयः; अतो मनो ह वा आयतनमित्युक्तम् ॥ ५ ॥ | जो आयतनको जानता है वह स्वजनोंका आयतन होता है अर्थात् उनका आश्रय बन जाता है। वह आयतन क्या है? इसपर श्रुति कहती है—मन ही आयतन है। इन्द्रियोंद्वारा लाये हुए एवं भोक्ताके प्रत्ययरूप विषयोंका मन ही आयतन यानी आश्रय है; इसलिये मन ही आयतन है—ऐसा कहा गया है ॥५॥ |
इन्द्रियोंका विवाद
अथ ह प्राणा अहꣳश्रेयसि व्यूदिरेऽहꣳ श्रेयानस्म्यहꣳ श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥
एक बार प्राण (इन्द्रियाँ) 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रकार अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करने लगे ॥ ६ ॥
| अथ ह प्राणा एवं यथोक्तगुणाः सन्तः अहंश्रेयसि 'अहं श्रेयानस्मि अहं श्रेयानस्मि' इत्येतस्मिन्प्रयोजने व्यूदिरे नाना विरुद्धं चोदिर उक्तवन्तः ॥६॥ | एक बार इस प्रकार पूर्वोक्त गुणोंसे युक्त प्राण अपनी श्रेष्ठताके लिये 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रयोजनसे विवाद करने लगे; अर्थात् बहुत-सी विरुद्ध बातें कहने लगे ॥ ६ ॥ |
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४७
प्रजापतिका निर्णय
ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन्को नः श्रेष्ठ इति तान्होवाच यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥
उन प्राणोंने अपने पिता प्रजापतिके पास जाकर कहा—'भगवन् ! हममें कौन श्रेष्ठ है ?' प्रजापतिने उनसे कहा—'तुममेंसे जिसके निकल जानेपर शरीर अत्यन्त पापिष्ठ-सा दिखायी देने लगे वही तुममें श्रेष्ठ है' ॥ ७ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ते ह ते हैवं विवदमाना आत्मनः श्रेष्ठत्वविज्ञानाय प्रजापतिं पितरं जनयितारं कञ्चिदेत्योचुरक्तवन्तः—हे भगवन्को नोऽस्माकं मध्ये श्रेष्ठोऽभ्यधिको गुणैः ? इत्येवं पृष्टवन्तः ।<br><br>तान्पितोवाच ह—यस्मिन्वो युष्माकं मध्य उत्क्रान्ते शरीरमिदं पापिष्ठमिवातिशयेन जीवतोऽपि समुत्क्रान्तप्राणं ततोऽपि पापिष्ठतरमिवातिशयेन दृश्येत कुणपमस्पृश्यमशुचि दृश्येत, स वो युष्माकं श्रेष्ठः, इत्यवोचत्काक्वा तद्दुःखं परिजिहीर्षुः ॥ ७ ॥ | इस प्रकार विवाद करते हुए वे अपनी श्रेष्ठताको विशेषरूपसे जाननेके लिये प्रजापति—अपने पिता यानी किसी उत्पत्तिकर्ताके पास जाकर बोले—'हे भगवन् ! हम सबमें कौन श्रेष्ठ है ?' अर्थात् गुणोंकेकारण कौन सबसे बढ़ा-चढ़ा है—ऐसा पूछा ।<br><br>उनसे पिताने कहा—'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर यह शरीर अतिशय पापिष्ठ-सा अर्थात् जीवित रहते हुए भी प्राणहीन तथा उससे भी अत्यन्त निकृष्ट-सा दिखायी दे और शवके समान अस्पृश्य एवं अपवित्र जान पड़े वही तुममें श्रेष्ठ है ।' इस प्रकार उनके दुःखकी निवृत्ति चाहते हुए प्रजापतिने काकुसे [अर्थात् स्वरभङ्ग-रूप उपायविशेषसे] उत्तर दिया ॥७॥ |
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