छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 444, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भवति, उत्तरमार्गप्रतिपत्तिहेतुरि-<br>त्यर्थः, यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवति । एवं-<br>विदं ह वै ब्रह्माणमृत्विजं प्रत्ये-<br>षानुगाथा ब्रह्मणः स्तुतिपरा—<br>यतो यत आवर्तते कर्म प्रदेषादृ-<br>त्विजां यज्ञः क्षतीभवंस्तत्तद्यज्ञस्य<br>क्षतरूपं प्रतिसंदधत्प्रायश्चित्तेन<br>गच्छति परिपालयतीत्येतत् ॥९॥ | दक्षिण ओर उठा हुआ—अर्थात्<br>उत्तरमार्गकी प्राप्तिका हेतु होता है।<br>इस प्रकार जाननेवाले ब्रह्मा<br>ऋत्विक्के विषयमें ही ब्रह्माकी<br>स्तुति करनेवाली यह अनुगाथा है-<br>जिस-जिस प्रदेशसे कर्म आवृत्त होता<br>है अर्थात् होता आदि ऋत्विजोंका<br>यज्ञ क्षतयुक्त होता है उस-उस<br>यज्ञके क्षतकी प्रायश्चित्तसे पूर्ति करता<br>हुआ ब्रह्मा जाता है अर्थात् यज्ञकर्त्ता-<br>की सब प्रकार रक्षा करता है ॥ ९ ॥ |
मानवो ब्रह्मैवैक ऋत्विक्कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानँसर्वाँश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविद्मेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥१०॥
एक मानव ब्रह्मा ही ऋत्विक् है। जिस प्रकार युद्धमें घोड़ी योद्धाओंकी रक्षा करती है उसी प्रकार ऐसा जाननेवाला ब्रह्मा यज्ञ, यजमान और अन्य समस्त ऋत्विजोंकी भी सब ओरसे रक्षा करता है। अतः इस प्रकार जाननेवालेको ही ब्रह्मा बनावे, ऐसा न जाननेवालेको नहीं, ऐसा न जाननेवालेको नहीं ॥ १० ॥
| मान वो ब्रह्मा मौनाचरणान्म-<br>ननाद्वा ज्ञानवत्त्वात्ततो ब्रह्मैवैक-<br>र्त्विक्कु रून्र्कतॄ न् योद्धनारूढानश्वा | मौनाचरण करनेसे अथवा मनन<br>करनेके कारण ब्रह्मा मानव है;<br>अतः ज्ञानवान् होनेके कारण<br>ब्रह्मा ही एक ऋत्विक् है। जिस<br>प्रकार युद्धमें घोड़ी ‘कुरून्’-- |