छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 445, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १७] शाङ्करभाष्यार्थ ४५१
| वडवा यथाभिरक्षत्येवंविद् ह वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तत्कृतदोषायनयनात् । यत एवं विशिष्टो ब्रह्मा विद्वान्, तस्मादेवंविदम् एव यथोक्तव्याहृत्यादिविदं ब्रह्माणं कुर्वीत, नानेवंविदं कदाचनेति । द्विरभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्त्यर्थः ॥ १० ॥ | कर्ताओंकी यानी अपनी पीठपर चढ़े हुए योद्धाओंकी सब प्रकारसे रक्षा करती है उसी प्रकार ऐसा जाननेवाला ब्रह्मा भी यज्ञ, यजमान और समस्त ऋत्विजोंकी, उनके किये हुए दोषोंकी निवृत्ति करके, सब ओरसे रक्षा करता है। क्योंकि विद्वान् ब्रह्मा ऐसा विशिष्टगुणसम्पन्न होता है इसलिये इस प्रकार—उपर्युक्त व्याहृति आदिका ज्ञान रखनेवालेको ही ब्रह्मा बनावे; इस प्रकार न जाननेवालेको कभी न बनावे। 'नानेवंविदं नानेवंविदम्' यह द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्तिके लिये है ॥ १० ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्विवरणे चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ॥ ४ ॥
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