भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 978 में से

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पृष्ठ 446

पञ्चम अध्याय

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प्रथम खण्ड


उपक्रमः
सगुणब्रह्मविद्याया उत्तरा गतिरुक्ता। अथेदानीं पञ्चमेऽध्याये पञ्चाग्निविदो गृहस्थस्योर्ध्वरेतसां च श्रद्धालूनां विद्यान्तरशीलिनां तामेव गतिमनूद्यान्या दक्षिणदिक्संबन्धिनी केवलकर्मिणां धूमादिलक्षणा पुनरावृत्तिरूपा, तृतीया च ततः कष्टतरा संसारगतिः, वैराग्यहेतोर्वक्तव्या इत्यारभ्यते। प्राणः श्रेष्ठो वागादिभ्यः प्राणो वाव संवर्ग इत्यादि च बहुशोऽतीते ग्रन्थे प्राणग्रहणं कृतम्, स कथं श्रेष्ठो वागादिषु सर्वैः संहत्यकारित्वाविशेषे, कथं[ गत अध्यायमें ] सगुण ब्रह्मविद्याकी उत्तर ( उत्तरायण मार्गरूपा ) गति कह दी गयी। अब इसके अनन्तर पञ्चम अध्यायमें पञ्चाग्निवेत्ता गृहस्थ तथा अन्य विद्याओंमें निष्ठा रखनेवाले श्रद्धालु ऊर्ध्वरेताओंकी उसी गतिका अनुवाद कर केवल कर्मपरायण पुरुषोंकी उससे भिन्न दक्षिण दिशासे सम्बन्ध रखनेवाली धूमादिलक्षणा पुनरावृत्तिरूपा गति और तीसरी उससे भी क्लिष्टतर संसारगतिका वैराग्यके लिये वर्णन करना है—इसीसे आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। वागादिकी अपेक्षा प्राण श्रेष्ठ है; क्योंकि गत ग्रन्थमें ‘प्राण ही संवर्ग है’ इत्यादि अनेकों प्रकारसे प्राणका ग्रहण किया गया है। ‘सबके साथ मिलकर कार्य करनेमें समानता होनेपर भी वह वागादि इन्द्रियोंमें श्रेष्ठ क्यों है ? और क्यों उसकी उपासना करनी चाहिये ?’—