भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 447

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४३


च तस्योपासनमिति तस्य श्रेष्ठत्वादिगुणविधित्सयेदमनन्तरमारभ्यते—। इस शङ्काकी निवृत्तिके लिये उसके श्रेष्ठत्व आदि गुणोंका विधान करनेकी इच्छासे यह आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है—

ज्येष्ठश्रेष्ठादिगुणोपासना

यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥

जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है। निश्चय ही प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है ॥ १ ॥

यो ह वै कश्चिज्ज्येष्ठं च प्रथमं वयसा श्रेष्ठं च गुणैरभ्यधिकं वेद, स ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति । फलेन पुरुषं प्रलोभ्याभिमुखीकृत्याह — प्राणो वाव ज्येष्ठश्च वयसा वागादिभ्यः । गर्भस्थे हि पुरुषे प्राणस्य वृत्तिर्वागादिभ्यः पूर्वं लब्धात्मिका भवति, यया गर्भो विवर्धते । चक्षुरादिस्थानावयवनिष्पत्तौ सत्यां पश्चाद्वागादीनां वृत्तिलाभ इति प्राणो ज्येष्ठो वयसा भवति । श्रेष्ठत्वं तु प्रति-जो कोई ज्येष्ठ—आयुमें प्रथम और श्रेष्ठ—गुणोंमें अधिकको जानता है वह निश्चय ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है। इस प्रकार फलके द्वारा पुरुषको प्रलोभित कर उसे प्राणोपासनाके अभिमुख कर श्रुति कहती है—वागादिकी अपेक्षा प्राण ही आयुमें ज्येष्ठ है, क्योंकि पुरुषके गर्भस्थ होनेपर वागादिकी अपेक्षा प्राणकी वृत्ति पहले लब्ध-स्वरूप होती है, जिससे कि गर्भ बढ़ता है । वागादिकी वृत्तियोंका लाभ तो चक्षुरादि गोलक और अवयवोंके निष्पन्न हो जानेके अनन्तर होता है; इसलिये आयुकी दृष्टिसे प्राण ज्येष्ठ है । तथा उसकी