छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 448, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
|---|
| पादयिष्यति सुहय इत्यादिभि- | श्रेष्ठताका तो 'सुहयः' इत्यादि | | दर्शनेन । अतः प्राण एव | दृष्टान्तद्वारा [ बारहवें मन्त्रमें ] | | ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्चास्मिन्कार्यकरण- | प्रतिपादन किया जायगा । अतः | | संघाते ॥ १ ॥ | इस कार्यकारणसंघातमें प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है ॥ १ ॥ |
<div align="center">-: ० :-</div>यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥
जो कोई वसिष्ठको जानता है वह स्वजातियोंमें वसिष्ठ होता है; निश्चय ही वाक् वसिष्ठ है ॥ २ ॥
| यो ह वै वसिष्ठं वसितृ तम- | जो कोई वसिष्ठ—अत्यन्त | | माच्छादयितृतमं वसुत्तमं वा | बसनेवाले अर्थात् आच्छादन करने- | | यो वेद स तथैव वसिष्ठो ह | वालेको अथवा अत्यन्त वसुमान् | | भवति स्वानां ज्ञातीनाम् । | (धनवान्) को जानता है वह | | कस्तर्हि वसिष्ठः ? इत्याह— | उसी प्रकार अपने सजातियोंमें | | वाग्वाव वसिष्ठः, वाग्मिनो हि | वसिष्ठ होता है। अच्छा तो वसिष्ठ | | पुरुषा वसन्त्यभिभवन्त्यन्यान्य- | कौन है ? इसपर श्रुति कहती है— | | सुमत्त्तमाश्च, अतो वाग्वसिष्ठः | निश्चय ही वाक् वसिष्ठ है; क्योंकि | | ॥ २ ॥ | वाग्मी (श्रेष्ठ वक्ता) लोग ही बसते | | | अर्थात् दूसरोंका पराभव करते हैं; | | | और अधिक धनवान् भी होते हैं; | | | अतः वाक् ही वसिष्ठ है ॥ २ ॥ |
<div align="center">-: ० :-</div>यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिँश्च लोकेऽमुष्मिँश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥
जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है वह इस लोक और परलोकमें प्रतिष्ठित होता है; चक्षु ही प्रतिष्ठा है ॥ ३ ॥