छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 449, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४५
| यो ह वै प्रतिष्ठां वेद स अस्मिँल्लोकेऽमुष्मिंश्च परे प्रतितिष्ठति ह । का तर्हि प्रतिष्ठा ? इत्याह—चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा । चक्षुषा हि पश्यन्समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति यस्मात्, अतः प्रतिष्ठा चक्षुः ॥ ३ ॥ | जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है वह इस लोक और परलोकमें प्रतिष्ठित होता है । अच्छा तो प्रतिष्ठा क्या है ? इसपर श्रुति कहती है—चक्षु ही प्रतिष्ठा है, क्योंकि चक्षुसे देखकर ही पुरुष सम और विषम प्रदेशमें स्थित होता है; इसलिये चक्षु ही प्रतिष्ठा है ॥३॥ |
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यो ह वै संपदं वेद सँहास्मै कामाः पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव संपत् ॥ ४ ॥
जो कोई सम्पद्को जानता है उसे दैव और मानुष काम ( भोग ) सम्यक् प्रकारसे प्राप्त होते हैं । श्रोत ही सम्पद् है ॥ ४ ॥
| यो ह वै संपदं वेद तस्मा अस्मै दैवाश्च मानुषाश्च कामाः संपद्यन्ते ह । का तर्हि संपद् ? इत्याह—श्रोत्रं वाव संपत् । यस्माच्छ्रोत्रेण वेदा गृह्यन्ते तदर्थविज्ञानं च, ततः कर्माणि क्रियन्ते, ततः कामसंपत् । इत्येवं कामसंपद्धेतुत्वाच्छ्रोत्रं वा संपत् ॥ ४ ॥ | जो कोई सम्पद्को जानता है उसे दैव और मानुष भोग सम्यक् प्रकारसे प्राप्त होते हैं । अच्छा तो सम्पद् क्या है ? इसपर श्रुति कहती है—श्रोत्र ही सम्पद् है, क्योंकि श्रोत्रसे वेद और उनके अथका विशेष ज्ञान ग्रहण किये जाते हैं, फिर कर्म किये जाते हैं और तदनन्तर भोगोंकी प्राप्ति होती है । इस प्रकार भोगोंकी प्राप्तिके हेतु होनेके कारण श्रोत्र ही सम्पद् हैं ॥ ४ ॥ |
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यो ह वा आयतनं वेदायतनँह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥