भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 978 में से

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पृष्ठ 450

४४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

जो आयतनको जानता है वह स्वजातियोंका आयतन (आश्रय) होता है। निश्चय ही मन आयतन है ॥ ५ ॥

| यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवत्याश्रयो भवतीत्यर्थः। किं तदायतनम्? इत्याह मनो ह वा आयतनम्। इन्द्रियोपहृतानां विषयाणां भोक्त्रर्थानां प्रत्ययरूपाणां मन आयतनमाश्रयः; अतो मनो ह वा आयतनमित्युक्तम् ॥ ५ ॥ | जो आयतनको जानता है वह स्वजनोंका आयतन होता है अर्थात् उनका आश्रय बन जाता है। वह आयतन क्या है? इसपर श्रुति कहती है—मन ही आयतन है। इन्द्रियोंद्वारा लाये हुए एवं भोक्ताके प्रत्ययरूप विषयोंका मन ही आयतन यानी आश्रय है; इसलिये मन ही आयतन है—ऐसा कहा गया है ॥५॥ |


इन्द्रियोंका विवाद

अथ ह प्राणा अहꣳश्रेयसि व्यूदिरेऽहꣳ श्रेयानस्म्यहꣳ श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥

एक बार प्राण (इन्द्रियाँ) 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रकार अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करने लगे ॥ ६ ॥

| अथ ह प्राणा एवं यथोक्तगुणाः सन्तः अहंश्रेयसि 'अहं श्रेयानस्मि अहं श्रेयानस्मि' इत्येतस्मिन्प्रयोजने व्यूदिरे नाना विरुद्धं चोदिर उक्तवन्तः ॥६॥ | एक बार इस प्रकार पूर्वोक्त गुणोंसे युक्त प्राण अपनी श्रेष्ठताके लिये 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रयोजनसे विवाद करने लगे; अर्थात् बहुत-सी विरुद्ध बातें कहने लगे ॥ ६ ॥ |

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