छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 451, कुल 978 में से
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४७
प्रजापतिका निर्णय
ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन्को नः श्रेष्ठ इति तान्होवाच यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥
उन प्राणोंने अपने पिता प्रजापतिके पास जाकर कहा—'भगवन् ! हममें कौन श्रेष्ठ है ?' प्रजापतिने उनसे कहा—'तुममेंसे जिसके निकल जानेपर शरीर अत्यन्त पापिष्ठ-सा दिखायी देने लगे वही तुममें श्रेष्ठ है' ॥ ७ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ते ह ते हैवं विवदमाना आत्मनः श्रेष्ठत्वविज्ञानाय प्रजापतिं पितरं जनयितारं कञ्चिदेत्योचुरक्तवन्तः—हे भगवन्को नोऽस्माकं मध्ये श्रेष्ठोऽभ्यधिको गुणैः ? इत्येवं पृष्टवन्तः ।<br><br>तान्पितोवाच ह—यस्मिन्वो युष्माकं मध्य उत्क्रान्ते शरीरमिदं पापिष्ठमिवातिशयेन जीवतोऽपि समुत्क्रान्तप्राणं ततोऽपि पापिष्ठतरमिवातिशयेन दृश्येत कुणपमस्पृश्यमशुचि दृश्येत, स वो युष्माकं श्रेष्ठः, इत्यवोचत्काक्वा तद्दुःखं परिजिहीर्षुः ॥ ७ ॥ | इस प्रकार विवाद करते हुए वे अपनी श्रेष्ठताको विशेषरूपसे जाननेके लिये प्रजापति—अपने पिता यानी किसी उत्पत्तिकर्ताके पास जाकर बोले—'हे भगवन् ! हम सबमें कौन श्रेष्ठ है ?' अर्थात् गुणोंकेकारण कौन सबसे बढ़ा-चढ़ा है—ऐसा पूछा ।<br><br>उनसे पिताने कहा—'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर यह शरीर अतिशय पापिष्ठ-सा अर्थात् जीवित रहते हुए भी प्राणहीन तथा उससे भी अत्यन्त निकृष्ट-सा दिखायी दे और शवके समान अस्पृश्य एवं अपवित्र जान पड़े वही तुममें श्रेष्ठ है ।' इस प्रकार उनके दुःखकी निवृत्ति चाहते हुए प्रजापतिने काकुसे [अर्थात् स्वरभङ्ग-रूप उपायविशेषसे] उत्तर दिया ॥७॥ |
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