छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 452, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 452
| ४४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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वागिन्द्रियकी परीक्षा
| तथोक्तेषु पित्रा प्राणेषु— | प्राणोंके प्रति पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर— |
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सा ह वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति ? यथा कला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥
उस वाक् इन्द्रियने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा 'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके?' [उन्होंने कहा--] 'जिस प्रकार गूँगे लोग बिना बोले प्राणसे प्राणन-क्रिया करते, नेत्रसे देखते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं उसी प्रकार [हम भी जीवित रहे]।' ऐसा सुनकर वाक् इन्द्रियने शरीरमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥
| सा ह वागुच्चक्रामोत्क्रान्तवती । सा चोत्क्रम्य संवत्सरमात्रं प्रोष्य स्वव्यापारान्निवृत्ता सती पुनः पर्येत्येतरान्प्राणानुवाच—कथं केन प्रकारेणाशकत शक्तवन्तो यूयं मद्ऋते मां विना जीवितुं धारयितुमात्मानमिति, ते होचुर्यथा कला इत्यादि । कला मूका यथा लोकेऽवदन्तो वाचा जीवन्ति । कथम् ? | उस वाक् इन्द्रियने उत्क्रमण किया। तथा उसने उत्क्रमण कर केवल एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर--अपने व्यापारसे निवृत्त रहकर फिर लौटकर अन्य प्राणोंसे कहा--'तुमलोग मेरे बिना कैसे किस प्रकारसे जीवित रह सके?' तब उन्होंने 'जिस प्रकार गूँगे' इत्यादि उत्तर दिया । जिस प्रकार 'कला:'-गूँगेलोग संसारमें वाणीसे बिना बोले भी जीवित रहते हैं—किस प्रकार ?—प्राणसे प्राणन |
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