छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थे ४३९
| सीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा चर्मबन्धनेन । एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण रसाख्येनौजसा यज्ञस्य विरिष्टं संदधाति । भेषजकृतो ह वा एष यज्ञः, रोगार्त इव पुमांश्चिकित्सकेन सुशिक्षितेनैष यज्ञो भवति । कोऽसौ ? यज्ञ यस्मिन्यज्ञ एवविद्यथोक्तव्याहृतिहोमप्रायश्चित्तविद्ब्रह्मात्विग्भवति स यज्ञ इत्यर्थः ॥ ७-८ ॥ | त्रपुसे सीसा, सीसेसे लोहा और लोहेसे काष्ठ अथवा चर्म—चमड़ेके बन्धनसे काष्ठको जोड़ा जाता है, उसी प्रकार इन लोक, देवता और त्रयीविद्याके वीर्य—रससंज्ञक ओजसे यज्ञक्षतकी पूर्ति करते हैं । सुशिक्षित चिकित्सकके द्वारा [नीरोग किये हुए] रोगार्त पुरुषके समान यह यज्ञ निश्चय ही मानो ओषधियोंद्वारा सुसंस्कृत होता है— कौन यज्ञ ? जहाँ अर्थात् जिस यज्ञमें इस प्रकार जाननेवाला यानी पूर्वोक्त व्याहृतिहोमरूप प्रायश्चित्त जाननेवाला ब्रह्मा ऋत्विक् होता है वह यज्ञ—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ७-८ ॥ |
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| किं च— | तथा— |
एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवत्येवंविदग्ँह वा एषा ब्रह्माणमनुगाथा यतो यत आवर्तते तत्तद्गच्छति ॥ ९ ॥
जहाँ इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्प्रवण होता है । इस प्रकार जाननेवाले ब्रह्माके उद्देश्यसे ही यह गाथा प्रसिद्ध है कि "जहाँ-जहाँ कर्म आवृत्त होता है वहीं वह पहुँच जाता है" ॥९॥
| एष ह वा उदक्प्रवण उदङ्निम्नो दक्षिणोच्छ्रायो यज्ञो | जहाँ इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्प्रवण- उत्तरकी ओर झुका हुआ और |