छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 442, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें४३८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
| ब्रह्मत्वमित्यनयैव त्रय्या विद्य- | है। जैसा कि "ब्रह्मत्व किसके द्वारा | | या" इति श्रुतेः। न्यायान्तरं वा | सिद्ध होता है? इस त्रयीविद्यासे | | | ही" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। | | | अथवा ब्रह्मत्वके कारण होनेवाले | | | यज्ञक्षतके लिये कोई और न्याय | | मृग्यं ब्रह्मत्वनिमित्ते रेषे ॥५-६॥ | ढूँढना चाहिये ॥ ५-६ ॥ |
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विद्वान् ब्रह्माकी विशिष्टता
तद्यथा लवणेन सुवर्णꣳसंदध्यात्सुवर्णेन रजतꣳ रजतेन त्रपु त्रपुणा सीसꣳसीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा ॥७॥ एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्टꣳसंदधाति भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवति॥८॥
इस विषयमें [ऐसा समझना चाहिये कि] जिस प्रकार लवण (क्षार) से सुवर्णको, सुवर्णसे चाँदीको, चाँदीसे त्रपुको, त्रपुसे सीसेको, सीसेसे लोहेको, और लोहेसे काष्ठको अथवा चमड़ेसे काष्ठको जोड़ा जाता है। उसी प्रकार इन लोक, देवता और त्रयीविद्याके वीर्यसे यज्ञके क्षतका प्रतिसंधान किया जाता है। जिसमें इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ निश्चय ही मानो ओषधियोंद्वारा संस्कृत होता है ॥७-८॥
| तद्यथा लवणेन सुवर्णं संद- | उस सम्बन्धमें [ऐसा समझना | | ध्यात् क्षारेण टङ्कणादिना। | चाहिये कि] जिस प्रकार लवण- | | | टङ्कणादि क्षारसे सुवर्णको जोड़ा | | खरे मृदुत्वकरं हि तत्। सुवर्णेन | जाता है, क्योंकि वह कठिन | | | सुवर्णको मृदु करनेवाला है, सुवर्ण- | | रजतमशक्यसंधानं संदध्यात्। | से चाँदीको—जिसका जुड़ना | | | अत्यन्त कठिन है—जोड़ते हैं, | | रजतेन तथा त्रपु, त्रपुणा सीसं | इसी प्रकार चाँदीसे त्रपु (राँगा), |