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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

२७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२७४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३
न वै तत्र यतोऽहं ब्रह्मलोकादागतस्तस्मिन्न वै तत्रैतदस्ति यत्पृच्छसि । न हि तत्र निम्लोचास्तमगमत्सविता न चोदियायोद्गतः कुतश्चित्कदाचन कस्मिंश्चिदपि काल इति ।<br><br>उदयास्तमयवर्जितो ब्रह्मलोक इत्यनुपपन्नमित्युक्तः शपथामिव प्रतिपेदे । हे देवाः साक्षिणो यूयं शृणुत यथा मयोक्तं सत्यं वचस्तेन सत्येनाहं ब्रह्मणा ब्रह्मस्वरूपेण मा विराधिषि मा विरुद्धयेयमप्राप्तिर्ब्रह्मणो मम मा भूदित्यर्थः ॥ २ ॥जहाँसे—जिस ब्रह्मलोकसे मैं आया हूँ—वहाँ उसमें निश्चय ही यह तुम जो कुछ पूछते हो नहीं है। वहाँ न तो सूर्यास्त होता है और न कभी—किसी भी समय सूर्य कहींसे उदित होता है।<br><br>ब्रह्मलोक सूर्यके उदय और अस्तसे रहित है—यह बात तो असङ्गत है—इस प्रकार कहे जानेपर वह मानो शपथ करता है—हे देवगण ! तुम साक्षी हो, सुनो—मैंने जो सत्य वचन कहा है उस सत्यके द्वारा मैं ब्रह्मसे—ब्रह्मके स्वरूपसे विरुद्ध न होऊँ; अर्थात् मुझे ब्रह्मकी अप्राप्ति न हो ॥ २ ॥

मधुविद्याका फल

सत्यं तेनोक्तमित्याह श्रुतिः—उसने सत्य ही कहा है—यह बात श्रुति बतलाती है—

न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥

जो इस प्रकार इस ब्रह्मोपनिषद् (वेदरहस्य) को जानता है उसके लिये न तो सूर्यका उदय होता है और न अस्त होता है। उसके लिये सर्वदा दिन ही रहता है ॥ ३ ॥

न ह वा अस्मै यथोक्तब्रह्मविदे नोदेति न निम्लोचतिइसके अर्थात् उपर्युक्त ब्रह्मवेत्ताके लिये न तो सूर्य उदित होता है और न अस्तमित ही होता है।

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७५


| नास्तमेति किन्तु ब्रह्मविदेऽस्मै सकृद्दिवा हैव सदैवाहर्भवति स्वयंज्योतिष्ट्वात् । य एतां यथोक्तां ब्रह्मोपनिषदं वेदगुह्यं वेद । एवं तन्त्रेण वंशादित्रयं प्रत्यमृतसम्बन्धं च यच्चान्यदवोचामैवं जानातीत्यर्थः । विद्वानुदयास्तमयकालापरिच्छेद्यं नित्यमजं ब्रह्म भवतीत्यर्थः ॥ ३ ॥ | बल्कि इस ब्रह्मवेत्ताके लिये 'सकृद्दिवा'—सर्वदा दिन ही बना रहता है, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशस्वरूप होता है [ ऐसा किसके लिये होता है ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं -- ] जो इस उपर्युक्त ब्रह्मोपनिषद्—वेदरहस्यको जानता है; अर्थात् जो शास्त्रद्वारा वंशादित्रय¹, प्रत्येक अमृतके साथ वस्तु आदिका सम्बन्ध तथा और भी जो कुछ हमने कहा है उसे उसी प्रकार जानता है । तात्पर्य यह है कि वह विद्वान् उदय और अस्तरूप कालसे अपरिच्छेद्य नित्य अजन्मा ब्रह्म ही हो जाता है ॥३॥ |


सम्प्रदायपरम्परा

तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्धैतदुद्दालकायारुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ४ ॥

वह यह मधुज्ञान ब्रह्माने विराट् प्रजापतिसे कहा था, प्रजापतिने मनुसे कहा और मनुने प्रजावर्गके प्रति कहा । तथा अपने ज्येष्ठ पुत्र अरुणनन्दन उद्दालकको उसके पिताने इस ब्रह्मविज्ञानका उपदेश दिया था ॥ ४ ॥

| तद्धैतन्मधुज्ञानं ब्रह्मा हिरण्यगर्भो विराजे प्रजापतय उवाच । | वह यह मधुज्ञान ब्रह्मा—हिरण्यगर्भने विराट् प्रजापतिको सुनाया था । उसने भी इसे मनुको सुनाया और |


१ तिरश्चीनवंश, मध्वपूप और मधुनाडी—इन तीनोंको ।

२७६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३

२७६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३


| सोऽपि मनवे । मनुरिक्ष्वाकाभ्यः प्रजाभ्यः प्रोवाचेति विद्यां स्तौति ब्रह्मादिविशिष्टक्रमागतेति । किं च तद्वैतन्मधुज्ञानमुद्दालकायारुणये पिता ब्रह्मविज्ञानं ज्येष्ठाय पुत्राय प्रोवाच ॥ ४ ॥ | मनुने इक्ष्वाकु आदि प्रजावर्ग (अपनी संतान) को सुनाया—इस प्रकार 'यह विद्या ब्रह्मादिविशिष्ट परम्परासे आयी है' ऐसा कहकर श्रुति इस विद्याकी स्तुति करती है। यही नहीं, यह मधुज्ञान अरुणपुत्र उद्दालकको अर्थात् यह ब्रह्मविज्ञान पिताने अपने ज्येष्ठ पुत्रको सुनाया था ॥४॥ |


इदं वाव तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात् प्रणाय्याय वान्तेवासिने ॥ ५ ॥

अतः इस ब्रह्मविज्ञानका पिता अपने ज्येष्ठ पुत्रको अथवा सुयोग्य शिष्यको उपदेश करे ॥ ५ ॥

| इदं वाव तद्यथोक्तमन्योऽपि ज्येष्ठाय पुत्राय सर्वप्रियार्हाय ब्रह्म प्रब्रूयात् । प्रणाय्याय वा योग्यायान्तेवासिने शिष्याय ॥ ५ ॥ | अतः कोई दूसरा विद्वान् भी यह उपर्युक्त ब्रह्मविज्ञान सबसे प्रिय वस्तुके पात्र अपने ज्येष्ठ पुत्रको ही बतावे, अथवा जो शिष्य सुयोग्य हो उससे कहे॥५॥ |

—: ० :—

नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥ ६ ॥

किसी दूसरेको नहीं बतलावे, यद्यपि इस आचार्यको यह समुद्र-परिवेष्टित और धनसे परिपूर्ण सारी पृथिवी दे [ तो भी किसी

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७७


दूसरेको इस विद्याका उपदेश न करे, क्योंकि ] उससे यही बढ़कर है, यही बढ़कर है ॥ ६ ॥

| नान्यस्मै कस्मैचन प्रब्रूयात्ती- <br> र्थद्वयमनुज्ञातमनेकेषां प्राप्तानां <br> तीर्थानामाचार्यादीनाम्। कस्मा- <br> त्पुनस्तीर्थसंकोचनं विद्यायाः <br> कृतम् ? इत्याह-यद्यप्यस्मा <br> आचार्याय इमां कश्चित्पृथिवी- <br> मद्भिः परिगृहीतां समुद्रपरि- <br> वेष्टितां समस्तामपि दद्यात्, यस्या <br> विद्याया निष्क्रयार्थम्, आचार्याय <br> धनस्य पूर्णां संपन्नां भोगोपकर- <br> णैः; नासावस्य निष्क्रयः, यस्मा- <br> त्ततोऽपि दानादेतदेव यन्मधुवि- <br> द्यादानं भूयो बहुतरफलमित्यर्थः। <br> द्विरभ्यास आदरार्थः ॥ ६ ॥ | किसी औरको इसका उपदेश <br> न करे—ऐसा कहकर श्रुतिने <br> आचार्य (विद्या देकर विद्या सीखने- <br> वाले) आदि अनेक तीर्थों (विद्या- <br> दानके पात्रों) मेंसे केवल दो तीर्थ <br> (ज्येष्ठ पुत्र और योग्य शिष्य) के <br> लिये ही आज्ञा दी है। किंतु इस <br> विद्याके पात्रोंका संकोच क्यों किया <br> गया है ? इसपर श्रुति कहती है— <br> यदि इस विद्याका बदला चुकानेके <br> लिये कोई पुरुष इस आचार्यको <br> जलसे परिगृहीत अर्थात् समुद्रसे <br> घिरी हुई और धनसे परिपूर्ण यानी <br> भोगकी सामग्रियोंसे सम्पन्न यह सारी <br> पृथिवी भी दे तो भी वह इसका बदला <br> नहीं हो सकता ? क्योंकि उस <br> दानसे भी यह मधुविद्याका दान ही <br> बड़ा—अधिक फलवाला है, ऐसा <br> इसका तात्पर्य है। द्विरुक्ति विद्याके <br> आदरके लिये है ॥ ६ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥

—:०:—

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द्वादश खण्ड

गायत्रीद्वारा ब्रह्मकी उपासना

यत एवमतिशयफलैषा ब्रह्म-विद्यातः सा प्रकारान्तरेणापि वक्तव्येति गायत्री वा इत्याद्यारभ्यते । गायत्रीद्वारेण चोच्यते, ब्रह्मणः सर्वविशेषरहितस्य नेति नेतीत्यादिविशेषप्रतिषेधगम्यस्य दुर्बोधत्वात्। सत्स्वनेकेषुच्छन्दःसु गायत्र्या एव ब्रह्मज्ञानद्वारतयोपादानं प्राधान्यात् । सोमाहरणादितरच्छन्दोऽक्षराहरणेनेतरच्छन्दो-क्योंकि इस प्रकार ब्रह्मविद्या अतिशय फलवती है इसलिये उसका अन्य प्रकारसे भी वर्णन करना चाहिये; इसीसे 'गायत्री वा' इत्यादि मन्त्रका आरम्भ किया जाता है। गायत्रीद्वारा भी ब्रह्मका ही निरूपण किया जाता है, क्योंकि 'नेति नेति' इत्यादि प्रकारसे विशेषोंके प्रतिषेध-द्वारा अनुभूत होनेवाला सर्वविशेष-रहित ब्रह्म कठिनतासे समझमें आने-वाला है। अनेकों छन्दोंके रहते हुए भी प्रधानताके कारण गायत्रीका ही ब्रह्मज्ञानके द्वाररूपसे ग्रहण किया जाता है। सोमाहरण^१ करनेसे अन्य छन्दोंके अक्षरोंको लानेसे^२,

१. एक बार सोमाभिलाषी देवताओंने सोम लानेके लिये गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती—इन तीन छन्दोंको नियुक्त किया; परंतु असमर्थ होनेके कारण जगती और त्रिष्टुप्—ये दो छन्द तो मार्गमेंसे ही लौट आये, केवल एक गायत्री छन्द ही सोमके पास जा सका और वही सोमके रक्षकोंको परास्त कर उसे देवताओंके पास लाया। यह कथा ऐतरेय ब्राह्मणमें 'सोमो वै राजाऽमुष्मिल्लोक आसीत्' इस प्रसङ्गमें आयी है।
२. गायत्रीके सिवा जो और छन्द सोम लानेके लिये गये थे वे मार्गमें ही थक जानेके कारण अपने कुछ अक्षर छोड़ आये थे। जगतीके तीन अक्षर और त्रिष्टुपका एक अक्षर—ये मार्गमें रह गये थे। इन्हें लाकर गायत्रीने उनकी पूर्ति की।

खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ [२७९


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
व्याप्त्या च सर्वसवनव्यापकत्वाच्च यज्ञे प्राधान्यं गायत्र्याः। गायत्रीसारत्वाच्च ब्राह्मणस्य, मातरमिव हित्वा गुरुतरां गायत्रीं ततोऽन्यद्गुरुतरं न प्रतिपद्यते यथोक्तं ब्रह्मापीति। तस्यामत्यन्तगौरवस्य प्रसिद्धत्वात्। अतो गायत्रीमुखेनैव ब्रह्मोच्यते—इतर छन्दोंमें व्याप्त^१ रहनेसे और सभी सवनोंमें व्यापक होनेसे^२ यज्ञमें गायत्रीकी प्रधानता है। क्योंकि ब्राह्मणका सार गायत्री ही है, इसलिये उपर्युक्त ब्रह्म भी माताके समान गुरुतरा गायत्री को छोड़कर उससे उत्कृष्टतर किसी अन्य आलम्बनको प्राप्त नहीं होता, क्योंकि उसमें लोकका अत्यन्त गौरव प्रसिद्ध ही है। अतः गायत्रीके द्वारा ही ब्रह्मका निरूपण किया जाता है—

गायत्री वा इदꣳ सर्वं भूतं यदिदं किं च वाग्वै गायत्री वाग्वा इदꣳ सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ १॥

गायत्री ही ये सब भूत-प्राणिवर्ग हैं। जो कुछ भी ये स्थावर-जंगम प्राणी हैं वे गायत्री ही हैं। वाक् ही गायत्री है और वाक् ही ये सब प्राणी हैं, क्योंकि यही गायत्री उनका गान (नामोच्चारण) करती और उनकी [ भय आदिसे ] रक्षा करती है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
गायत्री वा इत्यवधारणार्थो वैशब्दः। इदं सर्वं भूतं प्राणिजातं यत्किं च स्थावरं जङ्गमं वा तत्सर्वं गायत्र्येव। तस्याश्छन्दो-'गायत्री वै' इस पद में 'वै' शब्द निश्चयार्थक है। ये समस्त भूत अर्थात् ये जो कुछ स्थावर-जङ्गम प्राणी हैं वे सब गायत्री ही हैं। वह (गायत्री) तो केवल छन्दमात्र

पाद-टिप्पणी:

१. उष्णिक् और अनुष्टुप् आदि अन्य छन्दोंके प्रत्येक पादमें क्रमशः ७ और ८ आदि अक्षर होते हैं और गायत्रीके एक पादमें ६ अक्षर होते हैं; इसलिये यह उन छन्दोंमें भी व्याप्त है, क्योंकि अधिक संख्याकी सत्ता न्यून संख्याके बिना नहीं हो सकती।
२. प्रातःसवन गायत्र है, मध्याह्नसवन त्रैष्टुभ है और तृतीय सवन जागत है। अर्थात् गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती ये क्रमशः उनके छन्द हैं। गायत्री त्रिष्टुप् और जगतीमें व्याप्त है; इसलिये वह उन सवनोंमें भी व्यापक है।

२८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३


| मात्रायाःसर्वभूतत्वमनुपपन्नमिति गायत्रीकारणं वाचं शब्दरूपामापादयति गायत्रीम्, वाग्वै गायत्रीति ।<br><br>वाग्वा इदं सर्वं भूतम् ।<br><br>यस्माद्वाक्शब्दरूपा सती सर्वं भूतं गायति शब्दयत्यसौ गौरसावश्व इति च, त्रायते च रक्षत्यमुष्मान्मा भैषीः, किं ते भयमुत्थितम्, इत्यादिना सर्वतो भयान्निवर्त्यमानो वाचा त्रातःस्यात् । यद्वाग्भूतं गायति च त्रायते च गायत्र्येव तद्गायति च त्रायते च वाचोऽनन्यत्वाद्गायत्र्याः । गानात्त्राणाच्च गायत्र्या गायत्रीत्वम् ॥ १ ॥ | है, उसका सर्वभूतरूप होना तो सम्भव नहीं है; अतः 'वाग्वै गायत्री' ऐसा कहकर श्रुति गायत्रीकी कारणभूत शब्दरूप वाक्को ही गायत्री कहती है ।<br><br>वाक् ही यह सब भूतसमुदाय है; क्योंकि शब्दरूप हुई वाक् ही समस्त भूतोंका गान—शब्द यानी नामोल्लेख करती है; जैसे 'यह गौ है' 'यह अश्व है' इत्यादि; तथा यही त्राण—रक्षा करती है; जैसे 'इससे मत डर' 'तुझे क्या भय उत्पन्न हुआ है ?' इत्यादि वाक्योंसे सब ओरसे भयसे निवृत्त किये जानेपर वाणीके ही द्वारा मनुष्यकी रक्षा की जाती है । इस प्रकार वाणी जो प्राणियोंका गान और त्राण करती है वह गान और त्राण गायत्रीके द्वारा ही किया जाता है, क्योंकि गायत्री वाणीसे भिन्न नहीं है । गान और त्राण करनेके कारण ही गायत्रीका गायत्रीत्व है ॥ १ ॥ |


या वै सा गायत्र्ययं वाव सा येयं पृथिव्यस्याँ हीदँ सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयते ॥ २ ॥

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ २८१


जो वह गायत्री है वह यही है, जो कि यह पृथिवी है; क्योंकि इसीमें ये सब भूत स्थित हैं और इसीका वे कभी अतिक्रमण नहीं करते ॥ २ ॥

| या वै सैवंलक्षणा सर्वभूतरूपा गायत्री; इयं वाव सा येयं पृथिवी। कथं पुनरियं पृथिवी गायत्रीति? उच्यते—सर्वभूतसंबन्धात्। कथं सर्वभूतसंबन्धः? अस्यां पृथिव्यां हि यस्मात्सर्वं स्थावरं जङ्गमं च भूतं प्रतिष्ठितम्, एतामेव पृथिवीं नातिशीयते नातिवर्तत इत्येतत्।<br><br>यथा गानत्राणाभ्यां भूतसंबन्धो गायत्र्याः, एवं भूतप्रतिष्ठानाद्भूतसंबद्धा पृथिवी; अतो गायत्री पृथिवी ॥ २ ॥ | जो वह ऐसे लक्षणोंवाली सर्वभूतरूप गायत्री है वह यही है, जो कि यह पृथिवी है। किंतु यह पृथिवी गायत्री किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है—सम्पूर्ण प्राणियोंसे इसका सम्बन्ध होनेके कारण यह गायत्री है। इसका समस्त प्राणियोंसे किस प्रकार सम्बन्ध है? क्योंकि इस पृथिवीमें ही समस्त स्थावर तथा जङ्गम प्राणी स्थित हैं और वे इस पृथिवीका ही अतिक्रमण अर्थात् अतिवर्तन कभी नहीं करते।<br><br>जिस प्रकार गान और त्राणके कारण गायत्रीका प्राणियोंसे सम्बन्ध है उसी प्रकार भूतोंकी प्रतिष्ठा होनेके कारण पृथिवी भूतोंसे सम्बद्ध है अतः पृथिवी गायत्री है ॥ २ ॥ |


या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन्पुरुषे शरीरमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥ ३ ॥

जो भी यह पृथिवी है वह यही है जो कि इस पुरुषमें शरीर है; क्योंकि इसीमें ये प्राण स्थित हैं और इसीको वे कभी नहीं छोड़ते ॥ ३ ॥

२८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३


| या वै सा पृथिवी गायत्री; इयं वाव सेदमेव; तत्किम् ? यदिदमस्मिन्पुरुषे कार्यकारणसंघाते जीवति शरीरं पार्थिवत्वाच्छरीरस्य ।<br><br>कथं शरीरस्य गायत्रीत्वमिति ? उच्यते—अस्मिन्हीमे प्राणा भूतशब्दवाच्याः प्रतिष्ठिताः, अतः पृथिवीवद् भूतशब्दवाच्यप्राणप्रतिष्ठानाच्छरीरं गायत्री; एतदेव यस्माच्छरीरं नातिशीयन्ते प्राणाः ॥ ३ ॥ | जो भी वह पृथिवीरूप गायत्री है वह यह निश्चय ही है; यही कौन ? जो इस पुरुषमें—भूत और इन्द्रियोंके सजीव संघातमें शरीर है, क्योंकि शरीर पृथिवीका ही विकार है ।<br><br>शरीरका गायत्रीत्व किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है; क्योंकि इसीमें 'भूत' शब्दवाच्य प्राण प्रतिष्ठित हैं । अतः पृथिवीके समान 'भूत' शब्दवाच्य प्राणोंका अधिष्ठान होनेके कारण शरीर गायत्री है, क्योंकि प्राण इस शरीरका ही अतिक्रमण नहीं करते ॥ ३ ॥ |

—: ० :—

यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः-
पुरुषे हृदयमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव
नातिशीयन्ते ॥ ४ ॥

जो भी इस पुरुषमें शरीर है वह यही है, जो कि इस अन्तःपुरुषमें हृदय है; क्योंकि इसीमें ये प्राण प्रतिष्ठित हैं और इसीका अतिक्रमण नहीं करते ॥ ४ ॥

| यद्वै तत्पुरुषे शरीरं गायत्रीदं वाव तत् । यदिदमस्मिन्नन्तर्मध्ये पुरुषे हृदयं पुण्डरीकाख्यमेतद्गायत्री । कथम्? इत्याह—अस्मिन्हीमे | जो भी इस पुरुषमें शरीररूप गायत्री है वह यही है, जो कि इस अन्तःपुरुष—मध्यवर्ती पुरुषमें पुण्डरीकसंज्ञक हृदय है । वह गायत्री है । किस प्रकार ? सो बतलाते हैं— |

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २८३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
प्राणाः प्रतिष्ठिताः; अतः शरीरवद्गायत्री हृदयम् । एतदेव च नातिशीयन्ते प्राणाः । "प्राणो ह पिता प्राणो माता ।" ( छा० उ० ७ । १५ । १ ) "अहिंसन्सर्वभूतानि" ( छा० उ० ८ । १५ । १ ) इति च श्रुतेः, भूतशब्दवाच्याः प्राणाः ॥ ४ ॥क्योंकि इसीमें ये प्राण प्रतिष्ठित हैं । अतः शरीरके समान हृदय गायत्री है, क्योंकि प्राण इसका भी अतिक्रमण नहीं करते । "प्राण पिता है, प्राण माता है" "सम्पूर्ण प्राणियोंकी हिंसा न करते हुए" इत्यादि श्रुतियाँ होनेके कारण प्राण 'भूत' शब्दवाच्य हैं ॥ ४ ॥
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सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदृचाभ्यनूक्तम् ॥ ५ ॥

वह यह गायत्री चार चरणोंवाली और छः प्रकारकी है । वह यह [ गायत्र्याख्य ब्रह्म ] मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित किया गया है ॥ ५ ॥

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
सैषा चतुष्पदा षडक्षरपदा छन्दोरूपा सती भवति गायत्री षड्विधा वाग्भूतपृथिवीशरीरहृदयप्राणरूपा सती षड्विधा भवति । वाक्प्राणयोरन्यार्थनिर्दिष्टयोरपि गायत्रीप्रकारत्वम्; अन्यथा षड्विधसंख्यापूरणानुपपत्तेः । तदेतस्मिन्नर्थ एतद्गायत्र्याख्यं ब्रह्म गायत्र्यनुगतं गायत्रीमुखेनोक्त-वह यह चार पदोंवाली और छः-छः अक्षरोंके पदोंवाली है तथा वाक्, भूत, पृथिवी, शरीर, हृदय और प्राणरूपा होनेसे वह षड्विधा—छः प्रकारकी है । वाक् और प्राणका यद्यपि अन्य अर्थमें निर्देश किया गया है, तो भी वे गायत्रीके प्रकाररूपसे स्वीकृत किये जाते हैं; अन्यथा गायत्रीके छः प्रकारोंकी संख्या पूर्ण नहीं हो सकती । इसी अर्थमें यह गायत्रीसंज्ञक ब्रह्म, जो गायत्रीका

२८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२८४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| मृचापि मन्त्रेणाभ्यनूक्तं प्रकाशितम् ॥ ५ ॥ | अनुगत और गायत्रीद्वारा ही प्रतिपादित है, ऋचा यानी मन्त्रसे भी प्रकाशित किया गया है ॥ ५ ॥ |


कार्यब्रह्म और शुद्ध ब्रह्मका भेद

तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः। पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ६ ॥

[ ऊपर जो कुछ कहा गया है ] उतनी ही इस (गायत्र्याख्य ब्रह्म) की महिमा है; तथा [ निर्विकार ] पुरुष इससे भी उत्कृष्ट है। सम्पूर्ण भूत इसका एक पाद हैं और इसका [ पुरुषसंज्ञक ] त्रिपाद् अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित है ॥ ६ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तावानस्य गायत्र्याख्यस्य ब्रह्मणः समस्तस्य महिमा विभूतिविस्तारः । यावांश्चतुष्पात्षड्विधश्च ब्रह्मणो विकारः पादो गायत्रीति व्याख्यातः । अतस्तस्माद्विकारलक्षणाद्गायत्र्याख्याद्वाचारम्भणमात्रात्ततो ज्यायान्महत्तरश्च परमार्थसत्यरूपोऽविकारः पूरुषः पुरुषः सर्वपूरणात्पुरिशयनाच्च ।इस गायत्रीसंज्ञक समस्त (पादविभागविशिष्ट) ब्रह्मकी उतनी ही महिमा—विभूतिविस्तार है, जितना कि चार पादवाला और छः प्रकारका ब्रह्मका विकारभूत एक पाद गायत्री है; ऐसा कहकर निरूपण किया गया है। अतः उस विकारभूत वाचारम्भणमात्र गायत्रीसंज्ञक ब्रह्मसे परमार्थ सत्यस्वरूप निर्विकार पुरुष उत्कृष्ट महत्तर है; जो सबको पूरित करने तथा शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण पुरुष कहलाता है।

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २८५


| तस्यास्य पादः सर्वा सर्वाणि भूतानि तेजोऽबन्नादीनि सस्थावरजङ्गमानि । त्रिपात्त्रयः पादा अस्य सोऽयं त्रिपात् । त्रिपादामृतं पुरुषाख्यं समस्तस्य गायत्र्यात्मनो दिवि द्योतनवति स्वात्मन्यवस्थितमित्यर्थ इति ॥ ६ ॥ | तेज, अन्न और अप् आदि सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्राणी उस इस पुरुषका एक पाद हैं । तथा वह त्रिपात्—जिसके तीन पाद हों उसे 'त्रिपात्' कहते हैं—समस्त गायत्रीरूप पुरुषका पुरुषसंज्ञक त्रिपादामृत दिवि—द्युतिमान्‌में यानी प्रकाशस्वरूप स्वात्मामें स्थित है—ऐसा इसका तात्पर्य है॥६॥ |

— : ० : —

भूताकाश, देहाकाश और हृदयाकाशका अभेद

यद्वै तद्ब्रह्मेतीदं वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशो यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाशः ॥ ७॥ अयं वाव स योऽयमन्त पुरुष आकाशो यो वै सोऽन्तः पुरुष आकाशः ॥ ८ ॥ अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्ति पूर्णामप्रवर्तिनों२श्रियं लभते य एवं वेद ॥ ९ ॥

जो भी वह [त्रिपाद् अमृतरूप] ब्रह्म है वह यही है, जो कि यह पुरुषसे बाहर आकाश है; और जो भी यह पुरुषसे बाहर आकाश है। वह यही है जो कि यह पुरुषके भीतर आकाश है; तथा जो भी यह पुरुषके भीतर आकाश है। वह यही है जो कि हृदयके अन्तर्गत आकाश है। वह यह हृदयाकाश पूर्ण और कहीं भी प्रवृत्त न होनेवाला है। जो पुरुष ऐसा जानता है वह पूर्ण और कहीं प्रवृत्त न होनेवाली सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ ७–९ ॥

२८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२८६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| यद्वै तत्त्रिपादमृतं गायत्रीमुखेनोक्तं ब्रह्मेतीदं वाव तदिदमेव तयोऽयं प्रसिद्धो बहिर्धा बहिः पुरुषादाकाशो भौतिको यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाश उक्तः ॥७॥ अयं वाव स योऽयमन्तः पुरुषे शरीर आकाशः । | जो कभी गायत्रीके द्वारा कहा हुआ वह त्रिपाद् अमृत ब्रह्म है वह यही है—वह निश्चय यही है जो कि यह बाहरकी ओर—पुरुषसे बाहर प्रसिद्ध भौतिक आकाश है । तथा जो भी यह पुरुषसे बाहर आकाश बतलाया गया है ॥७॥ वह यही है जो पुरुष अर्थात् शरीरके भीतर आकाश है । | | यो वै सोऽन्तःपुरुष आकाशः ॥८॥ अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदये हृदयपुण्डरीक आकाशः । | जो भी वह पुरुषके भीतर आकाश है ॥८॥ वह यही है जो यह हृदयके भीतर अर्थात् हृदयपुण्डरीकमें आकाश है । | | कथमेकस्य सत आकाशस्य त्रिधा भेद इति ? उच्यते— बाह्येन्द्रियविषये जागरितस्थाने नभसि दुःखबाहुल्यं दृश्यते ततोऽन्तःशरीरे स्वप्नस्थानभूते मन्दतरं दुःखं भवति स्वप्नान् पश्यतः । हृदयस्थे पुनर्नभसि न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति । अतः सर्वदुःखनिवृत्तिरूपमाकाशं सुषुप्तस्थानम् । | एक होनेपर भी आकाशका तीन प्रकारका भेद क्यों है ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता है—जो बाह्य इन्द्रियोंका विषय है और जिसकी जाग्रत् अवस्थामें उपलब्धि होती है ऐसे इस आकाशमें दुःखकी बहुलता देखी जाती है । उसकी अपेक्षा स्वप्नमें उपलब्ध होनेवाले शरीरान्तर्गत आकाशमें स्वप्न देखनेवाले पुरुषको मन्दतर दुःख होता है । किन्तु हृदयस्थ आकाशमें जीव न तो किसी भोगकी इच्छा करता है और न कोई स्वप्न ही देखता है; अतः सुषुप्तिमें उपलब्ध होनेवाला आकाश सम्पूर्ण दुःखोंका निवृत्तिरूप है । |

खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ २८७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अतो युक्तमेकस्यापि त्रिधा भेदान्वाख्यानम् ।इसलिये एक ही आकाशके तीन भेदोंका कथन उचित ही है।
बहिर्धा पुरुषादारभ्याकाशस्य हृदये संकोचकरणं चेतःसमाधानस्थानस्तुतये यथा “त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते । अर्धतस्तु कुरुक्षेत्रमर्धतस्तु पृथूदकम्” इति तद्वत् ।पुरुषके बहिःस्थित आकाशसे लेकर जो हृदयदेशमें आकाशका संकोच किया गया है वह चित्तकी एकाग्रताके स्थानकी स्तुतिके लिये है; जिस प्रकार [ स्थानकी स्तुतिके लिये ही ऐसा कहा जाता है—]“तीनों लोकोंमें कुरुक्षेत्र उत्कृष्ट है तथा [ द्विदल धान्यके समान ] आधेमें कुरुक्षेत्र है और आधेमें 'पृथूदक' है” उसी प्रकार [ यहाँ हृदयाकाशकी स्तुति समझनी चाहिये ] ।
तदेतद्धार्दाकाशाख्यं ब्रह्म पूर्णं सर्वगतं न हृदयमात्रपरिच्छिन्नमिति मन्तव्यम्, यद्यपि हृदयाकाशे चेतः समाधीयते । अप्रवर्ति न कुतश्चित्क्वचित्प्रवर्तितं शीलमस्येत्यप्रवर्ति तदनुच्छित्तिधर्मकम् । यथान्यानि भूतानि परिच्छिन्नान्युच्छित्तिधर्मकाणि न तथा हार्दं नभः। पूर्णमप्रवर्तिनी-वह यह हृदयाकाशसंज्ञक ब्रह्म पूर्ण—सर्वगत है, वह केवल हृदयमात्रमें ही परिच्छिन्न है—ऐसा नहीं मानना चाहिये; यद्यपि चित्त केवल हृदयाकाशमें ही समाहित किया जाता है । वह अप्रवर्ति अर्थात् अविनाशी स्वभाववाला है—जिसका कभी कहीं प्रवृत्त होनेका स्वभाव न हो उसे अप्रवर्ति कहते हैं । जिस प्रकार अन्य परिच्छिन्न भूत उच्छित्ति(विनाश) धर्मवाले हैं उसी प्रकार हृदयाकाश नाशवान् नहीं है । जो पुरुष इस प्रकार उपर्युक्त पूर्ण और अविनाशी

२८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२८८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| मनुच्छेदात्मिकां श्रियं विभूतिं गुणफलं लभते दृष्टम्; य एवं यथोक्तं पूर्णाप्रवर्तिगुणं ब्रह्म वेद जानातीहैव जीवंस्तद्भावं प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ९ ॥ | गुणविशिष्ट ब्रह्मको जानता है वह पूर्ण और अप्रवर्तिनी-कभी नष्ट न होनेवाली श्री-विभूति इस दृष्ट गौण फलको प्राप्त करता है । अर्थात् इसी लोकमें यानी जीवित रहते हुए ही तद्रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥९॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥

त्रयोदश खण्ड

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हृदयान्तर्गत पूर्वसुषिभूत प्राणकी उपासना

तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ् सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेतत्तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥

उस इस प्रसिद्ध हृदयके पाँच देवसुषि हैं । इसका जो पूर्वदिशावर्ती सुषि ( छिद्र ) है वह प्राण है; वह चक्षु है, वह आदित्य है, वही यह तेज और अन्नाद्य है—इस प्रकार उपासना करे । जो इस प्रकार जानता है [ अर्थात् इस प्रकार इनकी उपासना करता है ] वह तेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है ॥ १ ॥

| तस्य ह वा इत्यादिना गायत्र्याख्यस्य ब्रह्मण उपासनाङ्गत्वेन द्वारपालादिगुणविधानार्थमारभ्यते । यथा लोके द्वारपाला राज्ञ उपासनेन वशीकृता राजप्राप्त्यर्था भवन्ति तथेहापीति । | इस ‘तस्य ह वा’ इत्यादि खण्डद्वारा गायत्रीसंज्ञक ब्रह्मकी उपासनाके अङ्गरूपसे द्वारपालादि गुणोंका विधान करनेके लिये [ यह उत्तर ग्रन्थ ] आरम्भ किया जाता है । क्योंकि जिस प्रकार लोकमें राजाके द्वारपाल उपासनासे ( भेंट आदि देकर ) अपने अधीन कर लिये जानेपर राजासे भेंट करनेमें उपयोगी होते हैं उसी प्रकार यहाँ भी [ इन उपासनाङ्गोंका उपयोग होता है ] । |

२९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२९०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तस्येति प्रकृतस्य हृदयस्येत्यर्थः। एतस्यानन्तरनिर्दिष्टस्य पञ्च पञ्चसंख्याका देवानां सुषयो देवसुषयः स्वर्गलोकप्राप्तिद्वारच्छिद्राणि, देवैः प्राणादित्यादिभी रक्ष्यमाणानीत्यतो देवसुषयः। तस्य स्वर्गलोकभवनस्य हृदयस्यास्य यः प्राङ् सुषिः पूर्वाभिमुखस्य प्राग्गतं यच्छिद्रं द्वारं स प्राणः, तत्स्थस्तेन द्वारेण यः संचरति वायुविशेषः स प्रागनितीति प्राणः।‘तस्य’ अर्थात् उस प्रकृत हृदयके, एतस्य—जिसका अव्यवहित पूर्वमें ही वर्णन किया गया है, पाँच-पाँच संख्यावाले देवसुषि—देवताओंके सुषि अर्थात् स्वर्गलोककी प्राप्तिके द्वारभूत पाँच छिद्र हैं। वे प्राण और आदित्य आदि देवताओंसे सुरक्षित हैं इसलिये देवसुषि कहलाते हैं। स्वर्गलोकके भवनरूप उस इस हृदयका जो प्राङ् सुषि है—पूर्वाभिमुख हृदयका जो पूर्वदिशावर्ती छिद्र यानी द्वार है वह प्राण है। जो उस हृदयमें ही स्थित है और उसीके द्वारा संचार करता है वह वायुविशेष ‘प्राक् अनिति’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार प्राण कहलाता है।
तेनैव संबद्धमव्यतिरिक्तं तच्चक्षुः, तथैव स आदित्यः “आदित्यो ह वै बाह्यः प्राणः” (प्र० उ० ३।८) इति श्रुतेश्चक्षूरूपप्रतिष्ठाक्रमेण हृदि स्थितः “स आदित्यः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति चक्षुषी” (बृ० उ० ३।९।२०) इत्यादि हि वाजसनेयके।उस (प्राण) हीसे सम्बद्ध और अभिन्न चक्षु है। इसी प्रकार वह आदित्य भी है, जैसा कि “आदित्य निश्चय ही बाह्य प्राण है” इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है। वह चक्षु और रूपके प्रतिष्ठाक्रमसे हृदयमें स्थित है। “वह आदित्य किसमें स्थित है ? चक्षुमें” इत्यादि वाजसनेय-श्रुतिमें कहा है। प्राण-

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९१


| प्राणवायुदेवतेव ह्येका चक्षुरादित्यश्च सहाश्रयेण। वक्ष्यति च 'प्राणाय स्वाहेति हुतं हविः सर्वमेतत्तर्पयतीति। <br><br> तदेतत्प्राणाख्यं स्वर्गलोकद्वारपालत्वाद्व्रह्म स्वर्गलोकं प्रतिपित्सुस्तेजश्चैतच्चक्षुरादित्यस्वरूपेणान्नाद्यत्वाच्च सवितुस्तेजोऽन्नाद्यमित्याभ्यां गुणाभ्यामुपासीत। ततस्तेजस्व्यन्नादश्चामयावित्वरहितो भवति य एवं वेद तस्यैतद्गुणफलम्। उपासनेन वशीकृतो द्वारपः स्वर्गलोकप्राप्तिहेतुर्भवतीति मुख्यं च फलम्॥१॥ | वायुरूप एक ही देवता एक ही आश्रयमें स्थित होनेके कारण चक्षु और आदित्य नामसे कहे जाते हैं। 'प्राणाय स्वाहा' ऐसा कहकर दिया हुआ हवि चक्षुरादि सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी तृप्ति करता है—ऐसा आगे कहेंगे भी। <br><br> वह यह प्राणाख्य ब्रह्म स्वर्गलोकका द्वारपाल है अतः स्वर्गप्राप्तिकी इच्छावाला पुरुष, यह चक्षु और आदित्यरूपसे तथा अन्नाद्यरूपसे सविताका तेज और अन्नाद्य है—इस प्रकार इन दो गुणोंसे इसकी उपासना करे। इससे वह तेजस्वी और अन्नाद अर्थात् रुग्णत्वादिसे रहित होता है। जो ऐसा जानता है उसे यह गौण फल प्राप्त होता है; किन्तु मुख्य फल तो यही है कि उपासनाद्वारा अपने अधीन किया हुआ वह द्वारपाल स्वर्गलोकप्राप्तिका कारण होता है ॥ १ ॥ |

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हृदयान्तर्गत दक्षिणसुषिभूत व्यानकी उपासना

अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रꣳ स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत श्रीमान्यशस्वी भवति य एवं वेद ॥ २ ॥

छा० उ० १०—

२९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२९२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है वह व्यान है, वह श्रोत्र है, वह चन्द्रमा है और वही यह श्री एवं यश है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो ऐसा जानता है वह श्रीमान् और यशस्वी होता है ॥ २ ॥

| अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिरस्तत्स्थो वायुविशेषः स वीर्यवत्कर्म कुर्वन्विगृह्य वा प्राणापानौ नाना वानीतीति व्यानस्तत्संबद्धमेव च तच्छ्रोत्रमिन्द्रियं तथा स चन्द्रमाः- “श्रोत्रेण सृष्टा दिशश्च चन्द्रमाश्च” इति श्रुतेः। सहाश्रयौ पूर्ववत्। <br><br> तदेतच्छ्रीश्च विभूतिः श्रोत्रचन्द्रमसोर्ज्ञानान्नहेतुत्वम् अतस्ताभ्यां श्रीत्वम्। ज्ञानान्नवतश्च यशः ख्यातिर्भवतीति यशोहेतुत्वाद्यशस्त्वम्, अतस्ताभ्यां गुणाभ्यामुपासीतेत्यादि समानम् ॥ २ ॥ | तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है उसमें स्थित जो वायुविशेष है वह वीर्यवान् कर्म करता हुआ गमन करता है या प्राण और अपानसे विरोध करके अथवा नाना प्रकारसे गमन करता है, इस कारण 'व्यान' कहलाता है। उससे सम्बद्ध जो श्रोत्र है वह इन्द्रिय है। तथा उसीसे सम्बद्ध वह चन्द्रमा है, जैसा कि “[ विराट्के ] श्रोत्रद्वारा दिशा और चन्द्रमा रचे गये हैं” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। पूर्ववत् ( चक्षु और आदित्यके समान ) ये भी एक ही आश्रयवाले हैं। <br><br> वह यह [ व्यानसंज्ञक ब्रह्म ] श्री यानी विभूति है। श्रोत्र और चन्द्रमा क्रमशः ज्ञान और अन्नके हेतु हैं; इसलिये उनके द्वारा व्यानका श्रीत्व माना गया है। ज्ञानवान् और अन्नवान्‌का यश अर्थात् प्रसिद्धि होती है; अतः यशका हेतु होनेसे उसकी यशःस्वरूपता है। अतः उन दो गुणोंसे युक्त उसकी उपासना करे—इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९३ ※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※

हृदयान्तर्गत पश्चिमसुषिभूत अपानकी उपासना

अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः सोऽपानः सा वाक्सो-
ऽग्निस्तदेतद्ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्य-
न्नादो भवति य एवं वेद ॥ ३ ॥

तथा इसका जो पश्चिम छिद्र है वह अपान है, वह वाक् है, वह अग्नि है और वही वह ब्रह्मतेज एवं अन्नाद्य है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो ऐसा जानता है वह ब्रह्मतेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी भाष्यार्थ
अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः पश्चिमस्तत्स्थो वायुविशेषः स मूत्रपुरीषाद्यपनयन्नधोऽनितीत्य-पानः सा तथा वाक्; तत्संबन्धात्, तथाग्निः तदेतद्ब्रह्मवर्चसं वृत्तस्वाध्यायनिमित्तं तेजो ब्रह्म-वर्चसम्; अग्निसंबन्धाद् वृत्तस्वाध्यायस्य। अन्नग्रसनहेतुत्वाद-पानस्यान्नाद्यत्वम्। समानमन्यत् ॥ ३ ॥तथा इसका जो प्रत्यङ् सुषि—प्रत्यङ् यानी पश्चिम उसमें स्थित जो वायुविशेष है वह मलमूत्रादिको दूर करता हुआ नीचेकी ओर ले जाता है। इसलिये 'अपान' कहलाता है। तथा वही वाक् और अग्नि है, क्योंकि इनका उस (समष्टि अपान) से सम्बन्ध है। वह यह ब्रह्मतेज है—सदाचार और स्वाध्यायके कारण होनेवाले तेजका नाम ब्रह्मवर्चस है, क्योंकि सदाचार और स्वाध्याय अग्निसे सम्बद्ध हैं। अन्न निगलनेमें हेतु होनेके कारण अपानका अन्नभोक्तृत्व स्वीकृत किया गया है। शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३ ॥

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