भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 289

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २८५


| तस्यास्य पादः सर्वा सर्वाणि भूतानि तेजोऽबन्नादीनि सस्थावरजङ्गमानि । त्रिपात्त्रयः पादा अस्य सोऽयं त्रिपात् । त्रिपादामृतं पुरुषाख्यं समस्तस्य गायत्र्यात्मनो दिवि द्योतनवति स्वात्मन्यवस्थितमित्यर्थ इति ॥ ६ ॥ | तेज, अन्न और अप् आदि सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्राणी उस इस पुरुषका एक पाद हैं । तथा वह त्रिपात्—जिसके तीन पाद हों उसे 'त्रिपात्' कहते हैं—समस्त गायत्रीरूप पुरुषका पुरुषसंज्ञक त्रिपादामृत दिवि—द्युतिमान्‌में यानी प्रकाशस्वरूप स्वात्मामें स्थित है—ऐसा इसका तात्पर्य है॥६॥ |

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भूताकाश, देहाकाश और हृदयाकाशका अभेद

यद्वै तद्ब्रह्मेतीदं वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशो यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाशः ॥ ७॥ अयं वाव स योऽयमन्त पुरुष आकाशो यो वै सोऽन्तः पुरुष आकाशः ॥ ८ ॥ अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्ति पूर्णामप्रवर्तिनों२श्रियं लभते य एवं वेद ॥ ९ ॥

जो भी वह [त्रिपाद् अमृतरूप] ब्रह्म है वह यही है, जो कि यह पुरुषसे बाहर आकाश है; और जो भी यह पुरुषसे बाहर आकाश है। वह यही है जो कि यह पुरुषके भीतर आकाश है; तथा जो भी यह पुरुषके भीतर आकाश है। वह यही है जो कि हृदयके अन्तर्गत आकाश है। वह यह हृदयाकाश पूर्ण और कहीं भी प्रवृत्त न होनेवाला है। जो पुरुष ऐसा जानता है वह पूर्ण और कहीं प्रवृत्त न होनेवाली सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ ७–९ ॥