छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 297, कुल 978 में से
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खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९३ ※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※
हृदयान्तर्गत पश्चिमसुषिभूत अपानकी उपासना
अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः सोऽपानः सा वाक्सो-
ऽग्निस्तदेतद्ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्य-
न्नादो भवति य एवं वेद ॥ ३ ॥
तथा इसका जो पश्चिम छिद्र है वह अपान है, वह वाक् है, वह अग्नि है और वही वह ब्रह्मतेज एवं अन्नाद्य है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो ऐसा जानता है वह ब्रह्मतेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है ॥ ३ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः पश्चिमस्तत्स्थो वायुविशेषः स मूत्रपुरीषाद्यपनयन्नधोऽनितीत्य-पानः सा तथा वाक्; तत्संबन्धात्, तथाग्निः तदेतद्ब्रह्मवर्चसं वृत्तस्वाध्यायनिमित्तं तेजो ब्रह्म-वर्चसम्; अग्निसंबन्धाद् वृत्तस्वाध्यायस्य। अन्नग्रसनहेतुत्वाद-पानस्यान्नाद्यत्वम्। समानमन्यत् ॥ ३ ॥ | तथा इसका जो प्रत्यङ् सुषि—प्रत्यङ् यानी पश्चिम उसमें स्थित जो वायुविशेष है वह मलमूत्रादिको दूर करता हुआ नीचेकी ओर ले जाता है। इसलिये 'अपान' कहलाता है। तथा वही वाक् और अग्नि है, क्योंकि इनका उस (समष्टि अपान) से सम्बन्ध है। वह यह ब्रह्मतेज है—सदाचार और स्वाध्यायके कारण होनेवाले तेजका नाम ब्रह्मवर्चस है, क्योंकि सदाचार और स्वाध्याय अग्निसे सम्बद्ध हैं। अन्न निगलनेमें हेतु होनेके कारण अपानका अन्नभोक्तृत्व स्वीकृत किया गया है। शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३ ॥ |
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