छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 296, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| २९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है वह व्यान है, वह श्रोत्र है, वह चन्द्रमा है और वही यह श्री एवं यश है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो ऐसा जानता है वह श्रीमान् और यशस्वी होता है ॥ २ ॥
| अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिरस्तत्स्थो वायुविशेषः स वीर्यवत्कर्म कुर्वन्विगृह्य वा प्राणापानौ नाना वानीतीति व्यानस्तत्संबद्धमेव च तच्छ्रोत्रमिन्द्रियं तथा स चन्द्रमाः- “श्रोत्रेण सृष्टा दिशश्च चन्द्रमाश्च” इति श्रुतेः। सहाश्रयौ पूर्ववत्। <br><br> तदेतच्छ्रीश्च विभूतिः श्रोत्रचन्द्रमसोर्ज्ञानान्नहेतुत्वम् अतस्ताभ्यां श्रीत्वम्। ज्ञानान्नवतश्च यशः ख्यातिर्भवतीति यशोहेतुत्वाद्यशस्त्वम्, अतस्ताभ्यां गुणाभ्यामुपासीतेत्यादि समानम् ॥ २ ॥ | तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है उसमें स्थित जो वायुविशेष है वह वीर्यवान् कर्म करता हुआ गमन करता है या प्राण और अपानसे विरोध करके अथवा नाना प्रकारसे गमन करता है, इस कारण 'व्यान' कहलाता है। उससे सम्बद्ध जो श्रोत्र है वह इन्द्रिय है। तथा उसीसे सम्बद्ध वह चन्द्रमा है, जैसा कि “[ विराट्के ] श्रोत्रद्वारा दिशा और चन्द्रमा रचे गये हैं” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। पूर्ववत् ( चक्षु और आदित्यके समान ) ये भी एक ही आश्रयवाले हैं। <br><br> वह यह [ व्यानसंज्ञक ब्रह्म ] श्री यानी विभूति है। श्रोत्र और चन्द्रमा क्रमशः ज्ञान और अन्नके हेतु हैं; इसलिये उनके द्वारा व्यानका श्रीत्व माना गया है। ज्ञानवान् और अन्नवान्का यश अर्थात् प्रसिद्धि होती है; अतः यशका हेतु होनेसे उसकी यशःस्वरूपता है। अतः उन दो गुणोंसे युक्त उसकी उपासना करे—इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |