छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९१
| प्राणवायुदेवतेव ह्येका चक्षुरादित्यश्च सहाश्रयेण। वक्ष्यति च 'प्राणाय स्वाहेति हुतं हविः सर्वमेतत्तर्पयतीति। <br><br> तदेतत्प्राणाख्यं स्वर्गलोकद्वारपालत्वाद्व्रह्म स्वर्गलोकं प्रतिपित्सुस्तेजश्चैतच्चक्षुरादित्यस्वरूपेणान्नाद्यत्वाच्च सवितुस्तेजोऽन्नाद्यमित्याभ्यां गुणाभ्यामुपासीत। ततस्तेजस्व्यन्नादश्चामयावित्वरहितो भवति य एवं वेद तस्यैतद्गुणफलम्। उपासनेन वशीकृतो द्वारपः स्वर्गलोकप्राप्तिहेतुर्भवतीति मुख्यं च फलम्॥१॥ | वायुरूप एक ही देवता एक ही आश्रयमें स्थित होनेके कारण चक्षु और आदित्य नामसे कहे जाते हैं। 'प्राणाय स्वाहा' ऐसा कहकर दिया हुआ हवि चक्षुरादि सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी तृप्ति करता है—ऐसा आगे कहेंगे भी। <br><br> वह यह प्राणाख्य ब्रह्म स्वर्गलोकका द्वारपाल है अतः स्वर्गप्राप्तिकी इच्छावाला पुरुष, यह चक्षु और आदित्यरूपसे तथा अन्नाद्यरूपसे सविताका तेज और अन्नाद्य है—इस प्रकार इन दो गुणोंसे इसकी उपासना करे। इससे वह तेजस्वी और अन्नाद अर्थात् रुग्णत्वादिसे रहित होता है। जो ऐसा जानता है उसे यह गौण फल प्राप्त होता है; किन्तु मुख्य फल तो यही है कि उपासनाद्वारा अपने अधीन किया हुआ वह द्वारपाल स्वर्गलोकप्राप्तिका कारण होता है ॥ १ ॥ |
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हृदयान्तर्गत दक्षिणसुषिभूत व्यानकी उपासना
अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रꣳ स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत श्रीमान्यशस्वी भवति य एवं वेद ॥ २ ॥
छा० उ० १०—