छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें२८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| या वै सा पृथिवी गायत्री; इयं वाव सेदमेव; तत्किम् ? यदिदमस्मिन्पुरुषे कार्यकारणसंघाते जीवति शरीरं पार्थिवत्वाच्छरीरस्य ।<br><br>कथं शरीरस्य गायत्रीत्वमिति ? उच्यते—अस्मिन्हीमे प्राणा भूतशब्दवाच्याः प्रतिष्ठिताः, अतः पृथिवीवद् भूतशब्दवाच्यप्राणप्रतिष्ठानाच्छरीरं गायत्री; एतदेव यस्माच्छरीरं नातिशीयन्ते प्राणाः ॥ ३ ॥ | जो भी वह पृथिवीरूप गायत्री है वह यह निश्चय ही है; यही कौन ? जो इस पुरुषमें—भूत और इन्द्रियोंके सजीव संघातमें शरीर है, क्योंकि शरीर पृथिवीका ही विकार है ।<br><br>शरीरका गायत्रीत्व किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है; क्योंकि इसीमें 'भूत' शब्दवाच्य प्राण प्रतिष्ठित हैं । अतः पृथिवीके समान 'भूत' शब्दवाच्य प्राणोंका अधिष्ठान होनेके कारण शरीर गायत्री है, क्योंकि प्राण इस शरीरका ही अतिक्रमण नहीं करते ॥ ३ ॥ |
—: ० :—
यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः-
पुरुषे हृदयमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव
नातिशीयन्ते ॥ ४ ॥
जो भी इस पुरुषमें शरीर है वह यही है, जो कि इस अन्तःपुरुषमें हृदय है; क्योंकि इसीमें ये प्राण प्रतिष्ठित हैं और इसीका अतिक्रमण नहीं करते ॥ ४ ॥
| यद्वै तत्पुरुषे शरीरं गायत्रीदं वाव तत् । यदिदमस्मिन्नन्तर्मध्ये पुरुषे हृदयं पुण्डरीकाख्यमेतद्गायत्री । कथम्? इत्याह—अस्मिन्हीमे | जो भी इस पुरुषमें शरीररूप गायत्री है वह यही है, जो कि इस अन्तःपुरुष—मध्यवर्ती पुरुषमें पुण्डरीकसंज्ञक हृदय है । वह गायत्री है । किस प्रकार ? सो बतलाते हैं— |