छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 278, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 278
| २७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| न वै तत्र यतोऽहं ब्रह्मलोकादागतस्तस्मिन्न वै तत्रैतदस्ति यत्पृच्छसि । न हि तत्र निम्लोचास्तमगमत्सविता न चोदियायोद्गतः कुतश्चित्कदाचन कस्मिंश्चिदपि काल इति ।<br><br>उदयास्तमयवर्जितो ब्रह्मलोक इत्यनुपपन्नमित्युक्तः शपथामिव प्रतिपेदे । हे देवाः साक्षिणो यूयं शृणुत यथा मयोक्तं सत्यं वचस्तेन सत्येनाहं ब्रह्मणा ब्रह्मस्वरूपेण मा विराधिषि मा विरुद्धयेयमप्राप्तिर्ब्रह्मणो मम मा भूदित्यर्थः ॥ २ ॥ | जहाँसे—जिस ब्रह्मलोकसे मैं आया हूँ—वहाँ उसमें निश्चय ही यह तुम जो कुछ पूछते हो नहीं है। वहाँ न तो सूर्यास्त होता है और न कभी—किसी भी समय सूर्य कहींसे उदित होता है।<br><br>ब्रह्मलोक सूर्यके उदय और अस्तसे रहित है—यह बात तो असङ्गत है—इस प्रकार कहे जानेपर वह मानो शपथ करता है—हे देवगण ! तुम साक्षी हो, सुनो—मैंने जो सत्य वचन कहा है उस सत्यके द्वारा मैं ब्रह्मसे—ब्रह्मके स्वरूपसे विरुद्ध न होऊँ; अर्थात् मुझे ब्रह्मकी अप्राप्ति न हो ॥ २ ॥ |
मधुविद्याका फल
| सत्यं तेनोक्तमित्याह श्रुतिः— | उसने सत्य ही कहा है—यह बात श्रुति बतलाती है— |
न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥
जो इस प्रकार इस ब्रह्मोपनिषद् (वेदरहस्य) को जानता है उसके लिये न तो सूर्यका उदय होता है और न अस्त होता है। उसके लिये सर्वदा दिन ही रहता है ॥ ३ ॥
| न ह वा अस्मै यथोक्तब्रह्मविदे नोदेति न निम्लोचति | इसके अर्थात् उपर्युक्त ब्रह्मवेत्ताके लिये न तो सूर्य उदित होता है और न अस्तमित ही होता है। |