भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 279

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७५


| नास्तमेति किन्तु ब्रह्मविदेऽस्मै सकृद्दिवा हैव सदैवाहर्भवति स्वयंज्योतिष्ट्वात् । य एतां यथोक्तां ब्रह्मोपनिषदं वेदगुह्यं वेद । एवं तन्त्रेण वंशादित्रयं प्रत्यमृतसम्बन्धं च यच्चान्यदवोचामैवं जानातीत्यर्थः । विद्वानुदयास्तमयकालापरिच्छेद्यं नित्यमजं ब्रह्म भवतीत्यर्थः ॥ ३ ॥ | बल्कि इस ब्रह्मवेत्ताके लिये 'सकृद्दिवा'—सर्वदा दिन ही बना रहता है, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशस्वरूप होता है [ ऐसा किसके लिये होता है ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं -- ] जो इस उपर्युक्त ब्रह्मोपनिषद्—वेदरहस्यको जानता है; अर्थात् जो शास्त्रद्वारा वंशादित्रय¹, प्रत्येक अमृतके साथ वस्तु आदिका सम्बन्ध तथा और भी जो कुछ हमने कहा है उसे उसी प्रकार जानता है । तात्पर्य यह है कि वह विद्वान् उदय और अस्तरूप कालसे अपरिच्छेद्य नित्य अजन्मा ब्रह्म ही हो जाता है ॥३॥ |


सम्प्रदायपरम्परा

तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्धैतदुद्दालकायारुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ४ ॥

वह यह मधुज्ञान ब्रह्माने विराट् प्रजापतिसे कहा था, प्रजापतिने मनुसे कहा और मनुने प्रजावर्गके प्रति कहा । तथा अपने ज्येष्ठ पुत्र अरुणनन्दन उद्दालकको उसके पिताने इस ब्रह्मविज्ञानका उपदेश दिया था ॥ ४ ॥

| तद्धैतन्मधुज्ञानं ब्रह्मा हिरण्यगर्भो विराजे प्रजापतय उवाच । | वह यह मधुज्ञान ब्रह्मा—हिरण्यगर्भने विराट् प्रजापतिको सुनाया था । उसने भी इसे मनुको सुनाया और |


१ तिरश्चीनवंश, मध्वपूप और मधुनाडी—इन तीनोंको ।