भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 978 में से

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पृष्ठ 293

त्रयोदश खण्ड

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हृदयान्तर्गत पूर्वसुषिभूत प्राणकी उपासना

तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ् सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेतत्तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥

उस इस प्रसिद्ध हृदयके पाँच देवसुषि हैं । इसका जो पूर्वदिशावर्ती सुषि ( छिद्र ) है वह प्राण है; वह चक्षु है, वह आदित्य है, वही यह तेज और अन्नाद्य है—इस प्रकार उपासना करे । जो इस प्रकार जानता है [ अर्थात् इस प्रकार इनकी उपासना करता है ] वह तेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है ॥ १ ॥

| तस्य ह वा इत्यादिना गायत्र्याख्यस्य ब्रह्मण उपासनाङ्गत्वेन द्वारपालादिगुणविधानार्थमारभ्यते । यथा लोके द्वारपाला राज्ञ उपासनेन वशीकृता राजप्राप्त्यर्था भवन्ति तथेहापीति । | इस ‘तस्य ह वा’ इत्यादि खण्डद्वारा गायत्रीसंज्ञक ब्रह्मकी उपासनाके अङ्गरूपसे द्वारपालादि गुणोंका विधान करनेके लिये [ यह उत्तर ग्रन्थ ] आरम्भ किया जाता है । क्योंकि जिस प्रकार लोकमें राजाके द्वारपाल उपासनासे ( भेंट आदि देकर ) अपने अधीन कर लिये जानेपर राजासे भेंट करनेमें उपयोगी होते हैं उसी प्रकार यहाँ भी [ इन उपासनाङ्गोंका उपयोग होता है ] । |