भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 978 में से

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पृष्ठ 281

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७७


दूसरेको इस विद्याका उपदेश न करे, क्योंकि ] उससे यही बढ़कर है, यही बढ़कर है ॥ ६ ॥

| नान्यस्मै कस्मैचन प्रब्रूयात्ती- <br> र्थद्वयमनुज्ञातमनेकेषां प्राप्तानां <br> तीर्थानामाचार्यादीनाम्। कस्मा- <br> त्पुनस्तीर्थसंकोचनं विद्यायाः <br> कृतम् ? इत्याह-यद्यप्यस्मा <br> आचार्याय इमां कश्चित्पृथिवी- <br> मद्भिः परिगृहीतां समुद्रपरि- <br> वेष्टितां समस्तामपि दद्यात्, यस्या <br> विद्याया निष्क्रयार्थम्, आचार्याय <br> धनस्य पूर्णां संपन्नां भोगोपकर- <br> णैः; नासावस्य निष्क्रयः, यस्मा- <br> त्ततोऽपि दानादेतदेव यन्मधुवि- <br> द्यादानं भूयो बहुतरफलमित्यर्थः। <br> द्विरभ्यास आदरार्थः ॥ ६ ॥ | किसी औरको इसका उपदेश <br> न करे—ऐसा कहकर श्रुतिने <br> आचार्य (विद्या देकर विद्या सीखने- <br> वाले) आदि अनेक तीर्थों (विद्या- <br> दानके पात्रों) मेंसे केवल दो तीर्थ <br> (ज्येष्ठ पुत्र और योग्य शिष्य) के <br> लिये ही आज्ञा दी है। किंतु इस <br> विद्याके पात्रोंका संकोच क्यों किया <br> गया है ? इसपर श्रुति कहती है— <br> यदि इस विद्याका बदला चुकानेके <br> लिये कोई पुरुष इस आचार्यको <br> जलसे परिगृहीत अर्थात् समुद्रसे <br> घिरी हुई और धनसे परिपूर्ण यानी <br> भोगकी सामग्रियोंसे सम्पन्न यह सारी <br> पृथिवी भी दे तो भी वह इसका बदला <br> नहीं हो सकता ? क्योंकि उस <br> दानसे भी यह मधुविद्याका दान ही <br> बड़ा—अधिक फलवाला है, ऐसा <br> इसका तात्पर्य है। द्विरुक्ति विद्याके <br> आदरके लिये है ॥ ६ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥

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