भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 291

खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ २८७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अतो युक्तमेकस्यापि त्रिधा भेदान्वाख्यानम् ।इसलिये एक ही आकाशके तीन भेदोंका कथन उचित ही है।
बहिर्धा पुरुषादारभ्याकाशस्य हृदये संकोचकरणं चेतःसमाधानस्थानस्तुतये यथा “त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते । अर्धतस्तु कुरुक्षेत्रमर्धतस्तु पृथूदकम्” इति तद्वत् ।पुरुषके बहिःस्थित आकाशसे लेकर जो हृदयदेशमें आकाशका संकोच किया गया है वह चित्तकी एकाग्रताके स्थानकी स्तुतिके लिये है; जिस प्रकार [ स्थानकी स्तुतिके लिये ही ऐसा कहा जाता है—]“तीनों लोकोंमें कुरुक्षेत्र उत्कृष्ट है तथा [ द्विदल धान्यके समान ] आधेमें कुरुक्षेत्र है और आधेमें 'पृथूदक' है” उसी प्रकार [ यहाँ हृदयाकाशकी स्तुति समझनी चाहिये ] ।
तदेतद्धार्दाकाशाख्यं ब्रह्म पूर्णं सर्वगतं न हृदयमात्रपरिच्छिन्नमिति मन्तव्यम्, यद्यपि हृदयाकाशे चेतः समाधीयते । अप्रवर्ति न कुतश्चित्क्वचित्प्रवर्तितं शीलमस्येत्यप्रवर्ति तदनुच्छित्तिधर्मकम् । यथान्यानि भूतानि परिच्छिन्नान्युच्छित्तिधर्मकाणि न तथा हार्दं नभः। पूर्णमप्रवर्तिनी-वह यह हृदयाकाशसंज्ञक ब्रह्म पूर्ण—सर्वगत है, वह केवल हृदयमात्रमें ही परिच्छिन्न है—ऐसा नहीं मानना चाहिये; यद्यपि चित्त केवल हृदयाकाशमें ही समाहित किया जाता है । वह अप्रवर्ति अर्थात् अविनाशी स्वभाववाला है—जिसका कभी कहीं प्रवृत्त होनेका स्वभाव न हो उसे अप्रवर्ति कहते हैं । जिस प्रकार अन्य परिच्छिन्न भूत उच्छित्ति(विनाश) धर्मवाले हैं उसी प्रकार हृदयाकाश नाशवान् नहीं है । जो पुरुष इस प्रकार उपर्युक्त पूर्ण और अविनाशी