छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 283, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ [२७९
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्याप्त्या च सर्वसवनव्यापकत्वाच्च यज्ञे प्राधान्यं गायत्र्याः। गायत्रीसारत्वाच्च ब्राह्मणस्य, मातरमिव हित्वा गुरुतरां गायत्रीं ततोऽन्यद्गुरुतरं न प्रतिपद्यते यथोक्तं ब्रह्मापीति। तस्यामत्यन्तगौरवस्य प्रसिद्धत्वात्। अतो गायत्रीमुखेनैव ब्रह्मोच्यते— | इतर छन्दोंमें व्याप्त^१ रहनेसे और सभी सवनोंमें व्यापक होनेसे^२ यज्ञमें गायत्रीकी प्रधानता है। क्योंकि ब्राह्मणका सार गायत्री ही है, इसलिये उपर्युक्त ब्रह्म भी माताके समान गुरुतरा गायत्री को छोड़कर उससे उत्कृष्टतर किसी अन्य आलम्बनको प्राप्त नहीं होता, क्योंकि उसमें लोकका अत्यन्त गौरव प्रसिद्ध ही है। अतः गायत्रीके द्वारा ही ब्रह्मका निरूपण किया जाता है— |
गायत्री वा इदꣳ सर्वं भूतं यदिदं किं च वाग्वै गायत्री वाग्वा इदꣳ सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ १॥
गायत्री ही ये सब भूत-प्राणिवर्ग हैं। जो कुछ भी ये स्थावर-जंगम प्राणी हैं वे गायत्री ही हैं। वाक् ही गायत्री है और वाक् ही ये सब प्राणी हैं, क्योंकि यही गायत्री उनका गान (नामोच्चारण) करती और उनकी [ भय आदिसे ] रक्षा करती है ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गायत्री वा इत्यवधारणार्थो वैशब्दः। इदं सर्वं भूतं प्राणिजातं यत्किं च स्थावरं जङ्गमं वा तत्सर्वं गायत्र्येव। तस्याश्छन्दो- | 'गायत्री वै' इस पद में 'वै' शब्द निश्चयार्थक है। ये समस्त भूत अर्थात् ये जो कुछ स्थावर-जङ्गम प्राणी हैं वे सब गायत्री ही हैं। वह (गायत्री) तो केवल छन्दमात्र |
पाद-टिप्पणी:
१. उष्णिक् और अनुष्टुप् आदि अन्य छन्दोंके प्रत्येक पादमें क्रमशः ७ और ८ आदि अक्षर होते हैं और गायत्रीके एक पादमें ६ अक्षर होते हैं; इसलिये यह उन छन्दोंमें भी व्याप्त है, क्योंकि अधिक संख्याकी सत्ता न्यून संख्याके बिना नहीं हो सकती।
२. प्रातःसवन गायत्र है, मध्याह्नसवन त्रैष्टुभ है और तृतीय सवन जागत है। अर्थात् गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती ये क्रमशः उनके छन्द हैं। गायत्री त्रिष्टुप् और जगतीमें व्याप्त है; इसलिये वह उन सवनोंमें भी व्यापक है।