छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 431, कुल 978 में से
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खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२७
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| सनायोपतिष्ठते । “स एनमविदितो न भुनक्ति” इति श्रुत्यन्तरात् । | “वह (परमात्मा) विदित न होनेपर इस अधिकारीका [मुक्ति प्रदान करके] पालन नहीं करता” इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है । |
| एष देवपथः, देवैरर्चिरादिभिर्गमयितृत्वेनाधिकृतैरुपलक्षितः पन्था देवपथ उच्यते । ब्रह्म गन्तव्यं तेन चोपलक्षित इति ब्रह्मपथः । एतेन प्रतिपद्यमाना गच्छन्तो ब्रह्मेमं मानवं मनुसंबन्धिनं मनोः सृष्टिलक्षणमावर्तं नावर्तन्त आवर्तन्तेऽस्मिञ्जनन-मरणप्रबन्धचक्रारूढा घटीयन्त्र-वत्पुनः पुनरित्यावर्तस्तं न प्रति-पद्यन्ते । नावर्तन्त इति द्विरुक्तिः सफलाया विद्यायाः परिसमाप्ति-प्रदर्शनार्था ॥ ५ ॥ | यह देवमार्ग है—उपासकको पहुँचानेके लिये अधिकारप्राप्त देवताओंसे उपलक्षित होनेके कारण यह मार्ग देवमार्ग कहलाता है, तथा ब्रह्म गन्तव्य (प्राप्तव्य) स्थान है, उससे उपलक्षित होता है, इसलिये वह ब्रह्ममार्ग है । इसके द्वारा ब्रह्मको प्राप्त हुए अर्थात् जानेवाले उपासक इस मानव—मनुसम्बन्धी अर्थात् मनुकी सृष्टिरूप आवर्तमें नहीं लौटते । जिसमें जन्म-मरणके प्रवाहरूप चक्रपर चढ़े हुए प्राणी घटीयन्त्रके समान पुनः-पुनः आवर्तन करते हैं उस इस लोकको 'आवर्त' कहते हैं, इसे वे प्राप्त नहीं होते । ‘नावर्तन्ते नावर्तन्ते’ यह द्विरुक्ति फलके सहित विद्याकी परिसमाप्ति प्रदर्शित करनेके लिये है ॥ ५ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥
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