भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 430, कुल 978 में से

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पृष्ठ 430
४२६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| संवत्सरं संवत्सरदेवतां ततः संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्तत्प्रस्थांस्तान् पुरुषः कश्चिद्ब्रह्मलोकादेत्यामानवो मानव्यां सृष्टौ भवो मानवो न मानवोऽमानवः स पुरुष एनान्ब्रह्म सत्यलोकस्थं गमयति गन्तृगन्तव्यगमयितृत्वव्यपदेशेभ्यः । सन्मात्रब्रह्मप्राप्तौ तदनुपपत्तेः । ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येतीति हि तत्र वक्तुं न्याय्यम् । सर्वभेदनिरासेन सन्मात्रप्रतिपत्तिं वक्ष्यति । न चादृष्टो मार्गोऽग- | भिमानी देवताको प्राप्त होते हैं । फिर संवत्सरसे आदित्यको, आदित्यसे चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होते हैं । वहाँ स्थित हुए उन उपासकोंको कोई अमानव—जो मानवी सृष्टिमें होता है उसे 'मानव' कहते हैं जो मानव न हो उसीका नाम 'अमानव' है; ऐसा कोई अमानव पुरुष ब्रह्मलोकसे आकर सत्यलोकमें स्थित ब्रह्मके पास पहुँचा देता है,। गमन करनेवाले, गन्तव्य स्थान और गमन करानेवालेका उल्लेख होनेके कारण [ यहाँ कार्यब्रह्म ही अभिप्रेत है ] क्योंकि सन्मात्र ब्रह्मकी प्राप्तिमें यह कुछ नहीं कहा जा सकता । वहाँ तो यही कहना न्याय्य है कि 'वह ब्रह्मरूप हुआ ही ब्रह्मको प्राप्त होता है'। आगे छठे (अध्यायमें) श्रुति सम्पूर्ण भेदके बाधद्वारा सन्मात्र ब्रह्मकी प्राप्तिका उल्लेख करेगी ।* तथा बिना देखा हुआ [ एकत्वरूप ] मार्ग तो मोक्षमें उपयोगी ही नहीं हो सकता । जैसा कि |


* यहाँ यह शङ्का होती है कि जब परमार्थतः जीव ब्रह्म ही है तो ब्रह्मके उपासकका भी लोकान्तरमें जाना ठीक नहीं है । उसका भी मोक्ष ही हो जाना चाहिये । इसका समाधान करनेके लिये आगेकी बात कहते हैं ।