छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 429, कुल 978 में से
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खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| माणे हि शवकर्माणि कर्मणां फलारम्भे प्रतिबन्धः कश्चिदनुमीयतेऽन्यत्र; यत इह विद्याफलारम्भकाले शवकर्म स्याद्वा न वेति विद्यावतोऽप्रतिबन्धेन फलारम्भं दर्शयति। ये सुखाकाशमक्षिस्थं संयद्वामो वामनीर्भामिनीरित्येवंगुणमुपासते प्राणसहितामग्निविद्यां च, तेषामन्यत् कर्म भवतु मा वा भूत्सर्वथापि तेऽर्चिषमेवाभिसंभवन्त्यर्चिरभिमानिनीं देवतामभिसंभवन्ति प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः। <br><br> अर्चिषोऽर्चिर्देवताया अहरहरभिमानिनीं देवतामह्न आपूर्यमाणपक्षं शुक्लपक्षदेवतामापूर्यमाणपक्षाद्यान्षण्मासानुदङ्ङुत्तरां दिशमेति सविता तान्मासानुत्तरायणदेवतां तेभ्यो मासेभ्यः | विद्वान्के सिवा अन्य किसीके लिये तो शवकर्म न करनेपर उसके कर्मफलके आरम्भमें कुछ प्रतिबन्ध होनेका अनुमान किया जाता है; क्योंकि यहाँ श्रुति उपासनाका फल आरम्भ होनेके समय केवल उपासकके लिये ही—उसका शवकर्म किया जाय अथवा न किया जाय—अप्रतिबन्धपूर्वक फलका आरम्भ दिखलाती है। जो लोग नेत्रमें स्थित संयद्वाम, वामनी और भामनी इत्यादि गुणोंसे युक्त सुखाकाशकी उपासना करते हैं तथा प्राणसहित अग्निविद्याकी उपासना करते हैं—उनका अन्य कर्म हो अथवा न हो—वे सर्वथा अर्चिरभिमानी देवताको ही प्राप्त होते हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है। <br><br> अर्चिः—अर्चिरभिमानी देवतासे अहः—अहरभिमानी (दिवसाभिमानी) देवताको, अहरभिमानी देवतासे आपूर्यमाण पक्ष—शुक्लपक्षदेवताको, शुक्लपक्षसे षडुदङ्—जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तर दिशामें चलता है उन महीनोंको अर्थात् उत्तरायण-देवताको, उन उत्तरायणके छः महीनोंसे संवत्सर—संवत्सरा- |