भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 978 में से

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पृष्ठ 422
४१८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १४

| भगव इति ह प्रतिशुश्राव । <br><br> ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं प्रसन्नं भाति, को नु त्वानुशशासेत्युक्तः प्रत्याह—को नु मानुशिष्यादनुशासनं कुर्यात्को भगवंस्त्वयि प्रोषित इतीहापेव निह्नुतेऽपनिह्नुत इवेति व्यवहितेन संबन्धः, न चापनिह्नुते न च यथावदग्निभिरुक्तं ब्रवीतीत्यभिप्रायः । <br><br> कथम् ? इमेऽग्नयो मया परिचरिता उक्तवन्तो नूनं यतस्त्वां दृष्ट्वा वेपमाना इवेदृशा दृश्यन्ते पूर्वमन्यादृशाः सन्त इतीहाग्नीनभ्यूदेऽभ्युक्तवान्काक्वाग्नीन्दर्शयन् । किं नु सोम्य किल ते तुभ्यमवोचन्नग्नय इति पृष्ट इत्येवमिदमुक्तवन्त इत्येवं ह प्रति- | उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया। फिर आचार्यद्वारा 'हे सोम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताके समान प्रसन्न बान पड़ता है, सो तुझे किसने उपदेश किया है, ऐसा कहे जानेपर वह बोला—'भगवन् ! आपके बाहर चले जानेपर भला मुझे कौन उपदेश करता ?' इस प्रकार मानो वह [ अग्निके कथनका ] अपह्नव- ( गोपन ) सा करने लगा। 'अप-इव निह्नुते' इसमें 'अप' उपसर्गका 'इव' के द्वारा व्यवधानयुक्त 'निह्नुते' क्रियाके साथ सम्बन्ध है, अतः 'अपनिह्नुते इव' ऐसा समझना चाहिये। तात्पर्य यह है कि वह अग्निके कथनको न तो ज्यो-का-त्यों बतलाता ही है और न उसे [सर्वथा] छिपाता ही है। <br><br> 'सो कैसे ? देखिये मेरे द्वारा परिचर्या किये हुए इन अग्नियोंने ही मुझे उपदेश किया है; क्योंकि अब आपको देखकर ये इस प्रकार काँपते हुए-से दिखायी देते हैं, जब कि पहले ये अन्य प्रकारके थे' इस प्रकार काकुवचन ( व्यङ्ग्योक्ति ) के द्वारा उसने अग्नियोंको बतलाया। फिर 'हे सोम्य ! अग्नियोंने तुझे क्या बतलाया है ? इस प्रकार पूछे जानेपर 'यही कहा है' |

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