छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 427, कुल 978 में से
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खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२३ ЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖ
| वामानि नयति य एवं वेद ॥३॥ | वामोंका (पुण्यकर्मफलोंका) वहन करता है ॥ ३ ॥ |
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एष उ एव भामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद ॥ ४ ॥
यही भामनी है, क्योंकि यही सम्पूर्ण लोकोंमें भासमान होता है। जो ऐसा जानता है वह सम्पूर्ण लोकोंमें भासमान होता है ॥ ४ ॥
| एष उ एव भामनीरेष हि यस्मात्सर्वेषु लोकेष्वादित्यचन्द्राग्न्यादिरूपैर्भाति दीप्यते । “तस्य भासा सर्वमिदं विभाति” (क० उ० ५।१६) इति श्रुतेः; अतो भामानि नयतीति भामनीः । य एवं वेदासावपि सर्वेषु लोकेषु भाति ॥ ४ ॥ | यही भामनी है, क्योंकि सम्पूर्ण लोकोंमें आदित्य, चन्द्र और अग्नि आदिके रूपोंमें यही भासमान—दीप्त होता है। “उसीके प्रकाशसे यह सब प्रकाशित है” इस श्रुतिसे यही सिद्ध होता है। अतः भामों (प्रकाशों) का वहन करता है इसलिये भामनी है। जो ऐसा जानता है वह भी सम्पूर्ण लोकमें भासमान होता है ॥ ४ ॥ |
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ब्रह्मवेत्ताकी गति
अथ यदु चैवास्मिञ्छव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेवाभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमपूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासांस्तान्यासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते नावर्तन्ते ॥ ५ ॥