छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 419, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१५
| अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास <br><br> प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति <br><br> ममाप्येताश्चतस्रस्तनवः । य एष <br><br> विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहम-<br><br>स्मीत्यादि पूर्ववत्सामान्यात् । <br><br> दिवाकाशयोस्त्वाश्रयत्वाद्बिद्युदा-<br><br>हवनीययोर्भोग्यत्वेनैव संबन्धः । <br><br> समानमन्यत् ॥ १-२ ॥ | तदनन्तर उसे आहवनीयाग्निने उपदेश किया—'प्राण, आकाश, द्युलोक और विद्युत्—ये मेरे भी चार शरीर हैं। यह जो विद्युत्में पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ' इत्यादि अर्थ पहलेहीके समान होनेके कारण पूर्ववत् है। द्युलोक और आकाशके साथ विद्युत् और आहवनीयका भोग्यरूपसे ही सम्बन्ध है, क्योंकि ये क्रमशः इनके आश्रय हैं। शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १-२ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥