छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 850, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें८४६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| नमित्यादिभिर्महद्भिः पुरुषार्थसाधनैः स्तुतत्वाद्ब्रह्मचर्यं परं ज्ञानस्य सहकारिकारणं साधनमित्यतो ब्रह्मविदा यत्नतो रक्षणीयमित्यर्थः । | अर्णवोंको गमन करनेके कारण अरणयायन है—इस प्रकारके पुरुषार्थके महान् साधनोंद्वारा स्तुति किया जानेके कारण ब्रह्मचर्य ज्ञानका परम सहकारी कारण है । अतः तात्पर्य यह है कि ब्रह्मवेत्ताको इसकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। | | तत्तत्र हि ब्रह्मलोकेऽरश्च ह वै प्रसिद्धौ ण्यश्चार्णवौ समुद्रौ समुद्रोपमे वा सरसी तृतीयस्यां भुवमन्तरिक्षं चापेक्ष्य तृतीया द्यौस्तस्यां तृतीयस्यामितोऽस्माल्लोकादारभ्य गण्यमानायां दिवि । तत्तत्रैव चैरम्मिदानं तन्मय ऐरो मण्डस्तेन पूर्णमैरं मदीयं तदुपयोगिनां मदकरं हर्षोत्पादकं सरः । तत्रैव चाश्वत्थो वृक्षः सोमसवनो नामतः सोमाऽमृतं तन्निस्स्रवोऽमृतस्रव इति वा । तत्रैव च ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्यसाधनरहितैर्ब्रह्मचर्यसाधनवद्भ्योऽन्यैर्न जीयत इत्यपराजिता नाम पूः पुरी ब्रह्मणो हिरण्यगर्भस्य । | वहाँ उस ब्रह्मलोकमें तीसरे अर्थात् इस लोकसे आरम्भ करनेपर भूलोंक और अन्तरिक्षकी अपेक्षा तीसरे द्युलोकमें प्रसिद्ध 'अर' और 'ण्य' ये दो समुद्र अथवा समुद्रके समान दो सरोवर हैं । तथा वहींपर ऐर—इरा अन्नको कहते हैं तन्मय ऐर अर्थात् मण्ड उससे भरा हुआ 'मदीय'—अपना उपयोग करनेवालोंको मद उत्पन्न करनेवाला अर्थात् हर्षोत्पादक सरोवर है । वहीं सोमसवन नामवाला अश्वत्थ वृक्ष है, अथवा सोम अमृतको कहते हैं उसका निस्रवण करनेवाला अमृतस्रावी वृक्ष है । वहाँ उस ब्रह्मलोकमें ही ब्रह्मचर्यरूप साधनसे रहित अर्थात् ब्रह्मचर्यसाधनवानोंसे भिन्न पुरुषोंद्वारा जो नहीं जीती जा सकती ऐसी ब्रह्मा यानी हिरण्यगर्भकी अपराजिता नामवाली पुरी |