भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 851

खण्ड ५] शाङ्करभाष्यार्थ ८४७


ब्रह्मणा च प्रभुणा विशेषेण मतं निर्मितं तच्च हिरण्मयं सौवर्णं प्रभुविमितं मण्डपमिति वाक्यशेषः ॥ ३ ॥है तथा ब्रह्मारूप प्रभुके द्वारा विशेषरूपसे मित—निर्मित (रची हुई) प्रभुविमित सुवर्णमय 'मण्डप है' ऐसा वाक्यशेष समझना चाहिये॥ ३॥

तद्य एवैतावरं च ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषाꣳसर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ४ ॥

उस ब्रह्मलोकमें जो लोग ब्रह्मचर्यके द्वारा इन 'अर' और 'ण्य' दोनों समुद्रोंको प्राप्त करते हैं उन्हींको इस ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छ गति हो जाती है ॥ ४ ॥

तत्तत्र ब्रह्मलोक एतावर्णावौ यावरण्याख्यावुक्तौ ब्रह्मचर्येण साधनेनानुविन्दन्ति ये तेषामेवैष यो व्याख्यातो ब्रह्मलोकस्तेषां च ब्रह्मचर्यसाधनवतां ब्रह्मविदां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति नान्येषामब्रह्मचर्यपराणां बाह्यविषयासक्तबुद्धीनां कदाचिदपीत्यर्थः ।<br><br>नन्वत्र त्वमिन्द्रस्त्वं यमस्त्वं वरुण इत्यादिभिर्यथा कश्चित्उस ब्रह्मलोकमें जो ये 'अर' और 'ण्य' नामवाले दो समुद्र कहे गये हैं इन्हें जो ब्रह्मचर्यरूप साधनके द्वारा प्राप्त करते हैं उन्हींको उस ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है, जिसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है । तथा उन ब्रह्मचर्यसाधनसम्पन्न ब्रह्मवेत्ताओंकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छ गति हो जाती है; ब्रह्मचर्यमें तत्पर न रहनेवाले अन्य बाह्य विषयासक्तबुद्धि पुरुषोंकी स्वेच्छागति कभी नहीं होती ।<br><br>किंतु यहाँ कुछ लोगोंका मत है कि जिस प्रकार 'तुम इन्द्र हो,