भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 858, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 858

षष्ठ खण्ड

—: ꕤ :—

हृदयनाडी और सूर्यरश्मिरूप मार्गकी उपासना

यस्तु हृदयपुण्डरीकगतं यथोक्तगुणविशिष्टं ब्रह्म ब्रह्मचर्यादिसाधनसम्पन्नस्त्यक्तबाह्यविषयानृततृष्णः सन्नुपास्ते तस्येयं मूर्धन्यया नाड्या गतिर्वक्तव्येति नाडीखण्ड आरभ्यते—जो पुरुष ब्रह्मचर्यादि साधनोंसे सम्पन्न और बाह्य विषयोंकी मिथ्या तृष्णासे निवृत्त होकर अपने हृदयकमलमें विराजमान उपर्युक्त गुणविशिष्ट ब्रह्मकी उपासना करता है उसकी यह मूर्धन्य नाडीके द्वारा गति बतलानी है; इसीलिये इस नाडीखण्डका आरम्भ किया जाता है—

अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष पीत एष लोहितः ॥ १ ॥

अब, ये जो हृदयकी नाडियाँ हैं वे पिंगलवर्ण सूक्ष्म रसकी हैं। वे शुक्ल, नील, पीत और लोहित रसकी हैं; क्योंकि यह आदित्य पिङ्गल वर्ण है, यह शुक्ल है, यह नील है, यह पीत है और यह लोहितवर्ण है ॥ १ ॥

अथ या एता वक्ष्यमाणा हृदयस्य पुण्डरीकाकारस्य ब्रह्मो-अब, आगे कहे जानेवाले ब्रह्मोपासनाके आश्रयभूत इस पुण्डरीकाकार हृदयकी जो उससे