छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
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अष्टादश
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मति ही जानने योग्य है.
यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य मनन करता है तभी वह विशेषरूपसे जानता है; बिना मनन किये कोई नहीं जानता, अपितु मनन करनेपर ही जानता है । अतः मतिकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं मतिके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥ १ ॥
| यदा वै मनुत इति । मतिर्मननं तर्को मन्तव्यविषय आदरः ॥१॥ | जिस समय मनन करता है इत्यादि । 'मति' अर्थात् मनन—तर्क—मन्तव्य विषयके प्रति आदर। |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्यायेऽष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १८ ॥