छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 771, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदश खण्ड
आशासे प्राणका प्राधान्य
| नामोपक्रममाशान्तं कार्य-कारणत्वेन निमित्तनैमित्तिकत्वेन चोत्तरोत्तरभूयस्तयावस्थितं स्मृतिनिमित्तसद्भावमाशारशनापाशैर्विपाशितं सर्वं सर्वतो बिसमिव तन्तुभिर्यस्मिन्प्राणे समर्पितम्, येन च सर्वतोव्यापिनान्तर्बहिर्गतेन सूत्रे मणिगणा इव सूत्रेण ग्रथितं विधृतं च स एषः— | नामसे लेकर आशापर्यन्त जो कार्यकारण एवं निमित्त-नैमित्तिक रूपसे उत्तरोत्तर बढ़कर स्थित है तथा जिसका सद्भाव स्मृतिके निमित्त-रूपसे सिद्ध होता है उस आशारूप जालसे तन्तुसे कमलनालके समान सब ओरसे जकड़ा हुआ यह सम्पूर्ण जगत् जिस प्राणमें समर्पित है तथा बाहर-भीतर व्याप्त हुए जिस सर्वगत सूत्र (प्राण) के द्वारा सूतमें मणियों [मनकों] के समान यह सब गूँथा हुआ और विधृत है। वह यह— |
प्राणो वा आशाया भूयान्यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन्प्राणे सर्वँसमर्पितम्। प्राणःप्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति। प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥ १ ॥
प्राण ही आशासे बढ़कर है। जिस प्रकार रथचक्रकी नाभिमें अरे समर्पित रहते हैं उसी प्रकार इस प्राणमें सारा जगत् समर्पित है। प्राण प्राण (अपनी शक्ति) के द्वारा गमन करता है; प्राण प्राणको देता है और प्राणके लिये ही देता है। प्राण ही पिता है; प्राण