छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 502, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें४९८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
| मासानतिदीर्घकालमन्तः शयि- | दीर्घकालपर्यन्त शयन करनेके अनन्तर [ जन्म लेना भी वैराग्यका ही हेतु है ] ॥ १ ॥ | | त्वेति च ॥ १ ॥ | |
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स जातो यावदायूषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः संभूतो भवति ॥ २॥
इस प्रकार उत्पन्न होनेपर वह आयुपर्यन्त जीवित रहता है। फिर मरनेपर कर्मवश परलोकको प्रस्थित हुए उस जीवको अग्निके प्रति ही ले जाते हैं, जहाँसे कि वह आया था और जिससे उत्पन्न हुआ था ॥२॥
| स एवं जातो यावदायूषं पुनः | इस प्रकार उत्पन्न हुआ वह जबतक आयु होती है घटीयन्त्रके समान पुनः-पुनः आवागमनके लिये | | पुनर्घटीयन्त्रवद्गमनागमनाय कर्म | | | कुर्वन्कुलालचक्रवद्वा तिर्यग्भ्रम- | अथवा कुलालचक्रके समान चारों ओर चक्कर काटनेके लिये कर्म करता हुआ कर्मद्वारा जितनी आयु | | णाय यावत्कर्मणोपात्तमायुस्ताव- | प्राप्त की होती है उतना जीवित रहता है। फिर जिसकी आयु क्षीण | | ज्जीवति । तमेनं क्षीणायुषं प्रेतं | हो गयी है ऐसे इस प्रेत—मृत एवं | | मृतं दिष्टं कर्मणा निर्दिष्टं पर- | दिष्ट—कर्मद्वारा परलोकके प्रति नियुक्त किये हुए इस जीवको—क्योंकि यदि वह जीवित रहता तो | | लोकं प्रति यदि चेज्जीवन्वौदिके | कर्म अथवा ज्ञानका अधिकारी होता अतः उस मरे हुए प्राणीको यहाँसे—इस ग्रामसे ऋत्विक् अथवा | | कर्मणि ज्ञाने वाधिकृतस्तमेनं | | | मृतमितोऽस्माद्ग्रामादग्नयेऽग्न्य- | | | र्थमृत्विजो हरन्ति पुत्रा वान्त्य- | |